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Lok Katha  – दामोदर चलो

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लोक कथा – दामोदर चलो

पुराने युग की बात है। संताल पुर्वज ना जाने कितने हजारों सालों से यहाँ रहते आये हुए हैं। लेकिन धीरे धीरे आर्य लोगों ने यहाँ आकर संताल लोगो से युद्ध करके सभी गाँव में बस गये ।

यह संताल पुर्वज को हमेशा से  डर लगा रहता है की  आर्य लोग फिर से आक्रमण ना कर दे। इसलिए वह  दर बदर  भटकते रहते थे। कभी इस जंगल तो कभी उस जंगल।

इस प्रकार से स्थान परिवर्तन कर के पश्चिम बंगाल इलाके की और पहुँच गये थे। शत्रु के भय से वह बार बार अपने स्थान  से आगे की और भाग जाते है।

इस प्रकार जाते समय रास्ते में एक विशाल नदी तक जा पहुंचे। नदी  बहुत विशाल और  गहरा था। उन लोगों ने तय किया की नदी को पार करना पड़ेगा । सब ने एक एक करके नदी में उतरने की तयारी की। जो लोग नदी में उतरते हैं वे डूब जाते हैं, बहुत से लोग डूब चुके हैं , इस प्रकार से बहुत लोग नदी में बह गये।

इसके बाद बचे हुए लोग नदी में उतरने का साहस नहीं किया।

Say No to Child Labour

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अगर नदी के उस पार नहीं गये तो शत्रु यहाँ भी पहुँच जायेंगे । इसलिए उन्होंने मारांगबुरु से प्रार्थना की। मारांगबुरु संताल लोगों के सबसे बड़े भगवान है, मारांगबुरु तुरंत उनकी भीड़ में प्रकट हुए और उसी नदी को आदेश दिया – “नदी! मैं तुमसे कहता हूं कि कुछ समय के लिए इन मनुष्यों को रास्ता छोड़ दो । जिस से वह आसानी से नदी पार कर सकें ।

Lok Katha – Damodar Chalo – Listen Audio

मारांगबुरु का प्रकट होना – Lok katha -दामोदर चलो

मारांगबुरु की  बातों  को  सूनकर नदी देवता प्रकट हुए और बोले,   “हे – मारांगबुरु में आपकी बातों का पालन करुंगा। में इन सब को निगलना चाहता हूँ , पर यदि वह नदी पार कर  लेंगे तो क्या आप फिर से वापस उन सबको लौटा पाएंगे ?

Lok Katha - damodar Chalo

Lok Katha

उसके बाद मारांगबुरु बोले की ठीक है  इनको लौटाने की चिंता मेरी है, लेकिन इस बार इनको एक बार रास्ता छोड़ दो। इसके बाद नदी देवता ने  मारांगबुरु की आज्ञा का पालन करते हुए नदी का जलधार दो हिस्सों  में बट गया और बिच का जगह खाली हो गया। उन खाली जगह पे संताल पूर्वज नदी पार हुए थे। नदी पार होने के बाद  जलराशि  फिर से  एक  हो गया। जिस के बाद  शत्रु इन लोगों के पास नहीं पहुँच पाया।

उसके बाद नदी के दूसरी ओर, मारांगबुरु पूर्वजों को बता रहें है कि “सत्यवचन करके नदी पार कर चुके हो । अत: जिस दिन आदिम जनजाति  लोगों में से कोई मृत्यु को प्राप्त करेगा  तो अस्थि बिसर्जन करने के लिए अपने पुत्रों के माध्यम से नदी तक पहुँचना होगा। क्या तुम लोग सभी इस  सत्यवचन का पालन करोगे ?”  सबने हाँ भरी।

उसी दिन से संताल समाज के लोगों में से कोई किसिका मृत्यु होता है तो  मारांगबुरु नाम लेकर शाल पत्ता से सिंदूर भरकर गले में अस्थि पुष्प धारण करके ऊस नदी के नाम से यात्रा शुरू करते है।

तेलकुपी गयाघाट और कारगाले घाट  – Lok katha -दामोदर चलो

उस नदी का नाम  दामोदर है। आज तक भी जिस भी अन्य नदी मैं घाट स्थापना करके अस्थि विसर्जन करवाया जाये, तो भी दामोदर गया हुआ बोला जायेगा।आज तक यह नदी पश्चिम बंगाल और झाडखंड मध्य बहता आ रहा है। इस नदी में  “तेलकुपी गयाघाट”  नाम का एक घाट है। इस तेलकुपी  घाट के ऊपर  एक “कारगाले घाट”  है।

जिसमें  संताल भाई लोग अस्थि विसर्जन  करवाते हैं। हमारे प्राच्य भूभाग में  संताल समाज में दामोदर चलो रीती अब भी चला आ रही है। लेकिन मरिसस, चीन, नेपाल और अन्य देश के संताल  समाज में यह रीती नहीं होती है।   इस से पता चलता है की यह कथाबस्तु कहानी मालूम पड़ते हुए भी सत्य घटना है।

इस  Lok Katha  में  जानिए कैसे आतु  शब्द पड़ा ?

दामोदर नदी पार करते  समय  बहुत सारे  संताल पूर्वज बह गये थे। और जो  मारांगबुरु के आशिर्वाद से बच गये थे उन सब आतुसारेज बोला गया। इसलिए इस आतुसारेज लोगों ने जहाँ रहना शुरु किया  उस जगह को आतु करके संबोधन करते है। (संताली भाषा में गाँव को आतु बोला जाता है। )  आज भी संताल लोग  बस्ती, झोपडी या  गाँव ना कह कर आतु कहते है।

Lok Katha – Damodar Chalo – Listen Audiobook

संताल समाज में अपने प्रियजन की मृत्यु होने के बाद अस्थि कलश को संभाल के रखते है। मकर संक्राति के शुभ दिन पर दामोदर घाट में विसर्जित करते है। अपने प्रियजन के लिए मुंडन होते है. दान, धर्म और दक्षिणा करवा के पूजा करते है । उन्हें लगता है की यह सब करके उनकी प्रियजनों की अमर आत्मा  मुक्ति  को प्राप्त हो कर मारांगबुरु के पास चला गया है। दामोदर जाना उनकी एक प्राचीन और अच्छी परम्परा है।

यह लोक कथा संताल समाज के प्रसिद्ध लोककथा में से एक है।

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Purani Adivasi Lok Katha Parvat ki Puja – पर्वत कि पूजा

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Adivasi Lok Katha - Bear and Man in Cave

Adivasi Lok Katha पर्वत कि पूजा  :  बहुत पहले की बात है। ओडिशा के कोरापुट जिले में परजा आदिवासी समुदाय के लोग रहते थे। उनमें से एक  डूमा नाम का एक आदमी रहता था। वह  बहुत  ही मूर्ख और आलसी इंसान था । एक दिन  जंगल में जा के लकड़ी लाता था और चार दिनों तक घर से बहार नहीं निकलता था।

दिन रात सो सो कर  समय अतिवाहित करता था। चार बच्चे और एक पत्नी को ले कर घर चलाना बहुत ही मुश्किल हो गया था। बच्चों के शरीर में हड्डियां दिखाई देने लगी। मुट्ठी भर चावल पकाना उसके लिए स्वप्न था। उसकी पत्नी बच्चों  का ऐसा हालत देखकर मन हि मन बहुत दुखी रहती थी । कुछ दिन बीत जाने के बाद बच्चों को खाना नहीं मिला।

यह देख कर पत्नी ने बोली – बच्चों की ऐसी हालत मुझसे नहीं देखी जा रही। तुम कुछ करते क्यों नहीं ? पत्थर बन गये हो क्या? पत्नी की बात सुनकर बिस्तर से उठ कर हाथ में कुल्हाड़ी पकड़ कर जंगल की ओर चला गया।

रास्ते में जाते समय टिप टिप बारिश शुरू हो गया। इसलिए वह पास वाले पर्वत की गुफा में जा रुका।

Adivasi Lok Katha  की  अन्य कहानिया

 

उसी गुफा में एक भालू रहता था। उस समय भालू शिकार के लिए दूसरे तरफ गया था। इन्सान का गंध पाकर अपनी गुफा की ओर जाना चाहता था। लेकिन उसी दिन वह ज्यादा  खाना खाने के बाद ठीक से उठ बैठ नहीं पाता था।

इसके बाद भालू बहुत मुश्किल से धीरे धीरे गुफा में जा पहुंचा। देखा कि एक आदमी सोया हुआ है। लेकिन क्या होगा ? भालू को खाने की इच्छा नहीं था । भालू ने सोचा की  इस आदमी को एक दिन रोक के रखूँगा दूसरे दिन इसको खाऊंगा। इसलिए भालू ने गुफा की द्वार पर सोया रहा।  ठीक उसी  समय  एक बड़ा सा पत्थर पर्वत के शिखर से गिर के गुफा को बंद कर दिया। पत्थर गिरने से डूमा और भालू का नींद टूट गया ।  दोनों डर के मारे एक दूसरे को जोर से  पकड़े हुए थे।

डूमा ने  भालू को पकड़ कर भय से कांप रहा था।  डूमा को कांपता हुआ देख  भालू ने बोला,- “हे इंसान तुम आज से मेरे दोस्त हुए। तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं। में तुम्हारा कुछ बुरा नहीं करूँगा। हम दोनों मुसीबत में पड़ें हैं।  इससे छुटकारा पाने के लिए आओ पर्वत देवता से प्रार्थना  करते हैं।“

इसके बाद दोनों पर्वत देवता से प्रार्थना करने लगे। उन दोनों ने प्रार्थना  कर के बोला की -“है पर्वत देवता हम दोनों को रक्षा करो। हम दोनों मर गए तो आपको क्या लाभ होगा।“ यह कह कर दोनों रोने लगे।

देखते ही देखते  गुफा  का  द्वार में जो पत्थर पड़ा था वह मिट्टी में परिवर्तित  हो गया। यह देख भालू ने  मिट्टी  खोद कर गुफा की द्वार को खोल दिया। उसी रास्ते से दोनों बाहर  निकल आये।

डूमा कैसे बना आमिर जानिए Adivasi Lok Katha में

इसके बाद डूमा ने बोला- “मेरे घर में बच्चे सब भूखे है। में कुछ लकड़ियां काट के ले जाता हूँ । उसे बेच कर  बच्चों के लिए कुछ खाना खरीद के ले जाऊंगा।“  यह सुन कर भालू ने बोला – “दोस्त इस पर्वत के दूसरे गुफा में  बहुत सारे मूल्यवान मणियां है।  में लाकर तुम  को देता हूँ। तुम उसे बाज़ार में बेच कर  घर चलाओगे। हर दिन मेरे पास  एक एक मणि लेकर जाना।“ डूमा ने मणियों को बेच कर बहुत सारा खाना, कपड़े  और  खिलौना  लिया।

बच्चे सब खुश हो गये। अच्छे अच्छे खाने को मिला। नए कपड़े पहने। नए खिलोने मिले।

यह सब देख कर पड़ोसी सब आश्चर्यचकित हो गये।  पडोसियों ने डूमा को पूछा की-  “तुम और तुम्हारे बच्चे सब नए नए दिख रहे हो। कहाँ से इतना सारा धन संपत्ति मिला ?” यह सुन कर डूमा ने सारी बातें बता दी।

इसके बाद उसी गाँव के सारे आदमी  पर्वत की और दौड़े। यह देख कर पर्वत भी धिरे धिरे पीछे हटना  शुरू किया। गांव वाले जितना जोर से भाग रहे थे  पर्वत भी उतनी तेजी से पीछे हट रहा था।

सारे  गांव वाले दौड़ते दौड़ते थक गये। और वहां पर बैठ गये। पर्वत से प्रार्थना की  हमें कुछ मणि दे दो नहीं तो यहाँ प्राण त्याग करेंगे। यह देख कर पर्वत की  मन में दया आई और कहा की – “हे मनुष्य, तुम सब कान खोल के सुनो डूमा मूर्ख होने के कारण कोई भी काम करने के असमर्थ था।  इसलिए उसका सब सुख दुःख समान था। यह देख उसका मित्र ने उसे मदद किया। लेकिन तुम सब लोग भले बुरे की परख जानते हो । मेहनत करके कमाने से दूसरा कोई आनंद नहीं है। मन में भक्ति रख कर आशीर्वाद लेकर खुशी से रहो।

ठीक उसी समय भालू का समय समाप्त हो जाने के बजह से  पर्वत के पैरो तले गिर कर मृत्यु को प्राप्त किया। यह देख कर पर्वत उसके ऊपर हाथ घुमाया तो वह मिट्टी में  मिल गया।

यह देख कर सब ने प्रणाम किये, बोले धन्य पर्वत, धन्य मिट्टी। आज से आप हमारे देवता हुए।

इसके बाद  पर्वत दूर चला गया ।  यह सब घटनाएं चैत्र  माह में हुआ था । इस घटना के बाद  परजा आदिवासी समुदाय के लोग मिट्टी और पर्वत को  पूजा करते दिखाई देते हैं।

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आशा करता हूँ की यह Adivasi Lok Katha आपको जरुर  पसंद आया होगा. इस तरह के  लोक कथायों को संग्रह करना  बहुत ही मुस्किल है. आदिम जन जातियों से मिलना , उनसे बात करना  उनकी कहानियों को संग्रह करना  मेहनत भरा काम है. पर इस तरह के Adivasi Lok Katha  को  आपके सामने  लाने के लिए प्रयास करूँगा.

 

 

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Purani Lok Katha Ramchandra Aur Shabari Budhiya | रामचंद्र और शबरी बुढ़िया

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Purani Lok Katha Ramchandra Aur Shabari Budhiya | रामचंद्र और शबरी बुढ़िया  : –

त्रेता युग की बात है। दुराचारी  रावण ने भेस बदल कर सीता माँ को अपहरण कर के सोने की लंका ले गया। राम लक्ष्मण दोनों भाई वन जंगल घूम रहे थे ।  वह दोनों सीता जी को ढूंढ रहे थे । क्यूँ की पंचवटी जंगल से  सीता देवी अंतर्धान हो गई थी।

घूमते घूमते उन्होंने किस्किंध्या राज्य में जा पहुंचे। वह राज्य  घने जंगल से घिरा हुआ था । यहाँ वहां छोटे छोटे आदिवासी शबर जातियों  का गांव था।

एक दिन की बात है । एक नब्बे साल की बुढ़िया वन दोनों भाईयों के साथ भेट  हुआ। बुढ़िया  राम जी के पैरो तले गिर कर प्रणाम किया । राम जी ने  बुढ़िया को बड़े ही प्यार से उठाये। बुढ़िया साथ में लाया हुआ कंदमूल-फल आदि  दिए। उनको खाने का अनुरोध किया । बुढ़िया ने अपने कुटिया पधारने के लिए अनुरोध किया।

करुणा सागर रामचंद्र जी मन की बात जान पाये। और बोले  – हम तो वनवासी हैं, जंगल में रहते है। गुफा ही हमारे लिए काफी है।  लेकिन  बूढीया भी इतने सहजता से छोड़ने वाली नहीं थी।  कुटिया ले जाने के लिए जिद पकड़ी। फिर राम जी राजी हो गये।  मकर संक्रांति के दिन जाने का वादा किया। इसके बाद राम जी वहां से चले गये।

Purani Lok Katha की अन्य कहानियों

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Tribal Story दामोदर चलो,     काल और कुइली,     टुडू युवक और बेश्रा युवति,    नुआखाई त्योहार, खूंटा और गयालमरा, किस्कू राजा और मरांडी महाजन
Biographies उत्कलमणि गोपबंधु दास,  महात्मा गांधी, मधुसूदन दास, सर्वपल्ली राधाकृष्णन
Story मुर्ख घासीराम,  कलश का गुण, बड़ों की बात सुनें, सोने का पिंजरा, बुलबुल की कहानी , बड़ा कौन

दो दिनों के बाद मकर संक्रांति।  प्रभु जी स्वयं यहाँ आयेंगे। शबर पल्ली उत्सव मुखर हो उठा।  घर घर आम और देवदार के पत्ते से तोरण सजाए गए।  सारे घर को लिपाई पुताई किए गए। दीवारों पर चित्र कला बनवाई गयीं । ढोल नगाड़े  शहनाई बजाई गयी।  सब नाच गाने में मशगूल हो गये । चारों और खुशी का माहौल था।

रामचंद्र जी हमेशा सत्य वचन रखते थे। प्रतिश्रुति का पालन करते हुए उन्हों ने शबर पल्ली में पहुँच गये।  गांव वाले उनका स्वागत संबर्धना किया। उन्होंने गाँव के बिच दो बड़े बड़े पत्थर रखे थे।  दोनों भाईयों के पैर धुला कर वहां पर  बिठाया।  सब के कुटिया से  मकर चावल  और मकर पीठा (मिठाइयाँ) लाकर  दोनों भाइयों के सामने रख दिए।

रामचंद्र जी सारे लोगों के भक्ति और श्रद्धा से संतुष्ट हुए। स्वयं बैठे हुए स्थान   से खड़े हुए। सब की थालियों से कुछ कुछ मकर चावल  लाकर खाए।

Purani Lok Katha में जानिये गाँव का नाम कैसे पड़ा

उसके बाद रामजी ने बुढ़िया  की कुटिया घुमने के लिए गये।  बुढ़िया ने उनकी खूब सेवा की। कुछ समय जाने के बाद  निकलने के लिए  तैयार हो रहे थे। जाने से पहले बुढ़िया को वर जांचा । बुढ़िया ने बोली   – आपका पैर यहाँ पे पड़ा बस इतना ही काफी।  मुझे कुछ जरुरत नहीं।  केवल आपको  याद रखने के लिए।  इस गाँव का नाम  राम पल्ली रखिये।

राम जी मुस्कराते हुए बोले – तुम्हारे लिए हम यहाँ पर आये।नहीं तो कभी नहीं आते। इसलिए गाँव का नाम तुम्हारा नामकरण से ही होगा।

बुढ़िया भक्ति भाव से रोने लगी।  – नहीं प्रभु, ऐसा मत किजिये।  में अनपढ़ औरत । मेरे नाम किसी को याद रखना जरूरत नहीं। कोई भी मेरे नाम को याद नहीं रखेंगे। कुछ दिनों के बाद  गाँव के नाम को  बदल देंगे।

रामजी हस हस के बोले , – माँ ! जब तक आकाश में सूर्य और चंद्र रहेगा तब तक मेरा  दिया हुआ नाम कभी भी नहीं मिटेगा।

बुढ़िया आश्चर्य में रह गयी। और बोली  –  मुझे माँ बुलाया ! आह, कितना मधुर है तुम्हरा माँ बुलाना।

इस माँ की स्मृति के लिए गाँव  का नाम कौशल्या पल्ली रखें , प्रभु । राम जी मुस्कराए  “तथास्तु” बोले।  गाँव वाले में इस बात के लिए उत्सव मनाये। इसके बाद रामजी वहां से लौट गये।

इस Purani Lok Katha की मान्यता  –

कौशल्या पल्ली  जटिल और  बड़ा नाम होने का कारण शबर लोगों ने  केवल  कौशल्या नाम से परिचित  करवाए। धीरे धीरे विकृत उच्चारण  से कुर्शुला  हो गया है। यह ओडिशा के कालाहांडी जिल्ले के केसिंगा ब्लॉक अधीन  कुर्शुला गाँव अवस्थित है। हर साल यहाँ मकर मेला बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है।

यह भी पढ़ें . . .

आपका बहु मूल्य समय देकर  Purani Lok Katha रामचंद्र और शबरी बुढ़िया की कहानी  पढ़ी, आपको बहुत बहुत धन्यवाद। इस तरह के कहानी आप के सामने लाने की प्रयास करूँगा ।

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Purani Lok Katha Kahani Nuakhai Tyohar | नुआखाई त्योहार

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Lok Katha Kahani Nuakhai Tyohar

Lok Katha Kahani Nuakhai Tyohar | नुआखाई त्योहार  :  कोरापुट जिल्ले में एक बड़ी आदिवासी आबादी गंड जनजाति के लोग रहते हैं. यहां हरा जंगल, पहाड़ों और झरना जैसे  प्राकृतिक सौंदर्य से भरा हुआ है. यहां पे विभिन्न प्रकार के आदिवासी रहते है  उन में से गंड प्रजाति एक है. लेकिन त्योहारों सभी एक जैसे है.

भाद्रव के महीने में प्रत्येक पेड़ पोधें फल फूल से भर सुन्दर दिखाई देते हैं. अनेक दिन पहले गंड जनजाति के बूढ़ा-बूढ़ी दोनों सरगी पेड़ के पत्तियां लाने के लिए जंगल की ओर गए थे. पत्तियां तोड़ ने के बाद उनकी नजर बांस के झाड़ियों पे पड़ी. उनको एक सफ़ेद चीज दिखाई पड़ी. उसके पास गए तो वह तुरंत ही ऊपर उड गया. निचे देखकर बोला क्या तुम लोगों ने पहले कभी मुझे देखा है ?

बूढ़ा-बूढ़ी दोनों शर हिला कर मना किये, “तुम्हें  पहले कभी नहीं देखा है.  तुम कौन हो ?” यह सुनकर उसने बोला  – “मैं गरुड़ पक्षी हूँ ” . बूढ़ा-बूढ़ी दोनों कभी गरुड़ पक्षी का नाम नहीं सुने थे. उन्होंने उसको प्यार से बुलाया. गरुड़ पक्षी उनके पास आया. गरुड़ पक्षी को देख कर बूढ़ा-बूढ़ी दोनों ने पूछे “तुम्हारा घर कहाँ है ?” उसने बोला,“मेरा घर गोविंदपुर में है. गोविंद अर्थात “श्री हरी, उनका पुर का नाम “बैकुंठ”.उसी गोविंद के हाथ में मेरा डोर है.

जिस समय गोविंद सोते रहते हैं, उस वक्त में गरुड़ पक्षी होकर उड़ के आता हूँ . वन जंगल, तथा जनबसती आदि की खबर लेता हूँ. वह निद्रा से जागने के बाद समस्त विषय में जानकारी दे देता हूँ. इस तरह ब्रह्मांड का खबर जान पाते हैं और सब को मदद करते हैं.

बूढ़ीया बोलती है की-“गोविंदपुर कैसा दिखता है?”गरुड़ पक्षी  बोलता है की “वह स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर है. जहाँ हताशा, निराशा, आलस्य और दरिद्रता का कोई जगह नहीं है. चारों और सुख सुविधा है और तरह तरह की पकवान माँ लक्ष्मीजी स्वयं बनाती हैं. वह बड़े ही स्वादिष्ट होते हैं.”

यह सुनकर बूढ़ा-बूढ़ी दोनों बहुत खुश हो जाते हैं.इसके बाद बुढा ने बोला की –गोविंदपुर से कुछ नया चीज लाकर हमको खाने को दो.जरा हम भी उसका आनंद ले सकें.

गरुड़ पक्षी राजी हो गया और वहां से उड़ गया और कुछ देर बाद  “गोविंदवल्लभ”नामक कुछ मिठाइयाँ और खिचड़ी ले कर आया. उन दोनों को खाने को दिया.

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बूढ़ा-बूढ़ी दोनों स्वादिष्ट पकवान खाकर बहुत खुश हुए. इसके बाद गरुड़ पक्षी बोला –“तुम लोग कभी भी जंगल में पशु पक्षियों का शिकार नहीं करोगे. में हर दिन ऐसा  गोविंद वल्लभ और खिचड़ी लाकर तुम को दूंगा”. बूढ़ा-बूढ़ी दोनों ने हाँ भरी. गरुड़ पक्षी वहां से उड़ कर अपने स्थान को चला गया.

कूछ दिन बीत जाने के बाद मिठाइयाँ और खिचड़ी खा खा कर बुढा को अच्छा नहीं लग रहा था. उसने खाना बदलना चाहा, उसके मन में मांस खाने की बहुत ही इच्छा हुई. एक दिन बुढ़िया को ना बता कर जंगल की ओर चला गया.वहां पे कुछ चिड़ियों को मारा. उनको आग में सेंक कर खाना शुरू किया.

ठीक उसी वक्त बुढ़िया उसे ढूंढते हुए वहां पहुंचा. बुढा को देखते हुए बुढ़िया की मुहँ से लार टपका. बुढ़िया जैसे ही खाना शुरू किया, अचानक  गरुड़ पक्षी आ पहुँचा. यह सब देख कर उसको बहुत दुःख हुआ. और बोला तुम लोग मेरा बात नहीं माने. हमारे पक्षी जाती का विनाश किया इसलिए तुम को कभी भी गोविंदवल्लभ और खिचड़ी ला कर नहीं दूंगा.

यह सुनकर बूढ़ा-बूढ़ी दोनों बहुत दुःख प्रकाश किये. गरुड़ पक्षी के पैरो तले गिर कर माफ़ी मांगे. “हम आपसे भरोसा कर के जी रहे थे .इसके बाद कैसे जीयेंगे.” बूढ़ा-बूढ़ी दोनों को कुछ कह पाए श्री हरी जी का निद्राभंग होने का सुचना पाकर गरुड़ पक्षी वहां से चला गया. उसके जाने के बाद बूढ़ा ने बोला “ हाय ! हम ने ये क्या अनर्थ कर दिया ?

Lok Katha Kahani नुआखाई त्योहार धार्मिक मान्यता

इसके बाद वहां के गंड आदिवासीयों ने इस लोक कथा के मुताबिक भाद्रव के महीने में गरुड़ पक्षी से गोविंद वल्लभ और खिचड़ी मिला हुआ था इसलिए इस महीने में नुआखाई पर्व मानते है. नुआखाई का मतलब नया खाना.

नुआखाई त्योहार पश्चिमी ओडिशा के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है. इस त्योहार में नए कपडे पहन कर, नई कटी फसल को देवी माँ को भोग अर्पित कर के उत्सव मनाया जाता है. यह एक कृषि भित्तिक पर्व है जो पश्चीमि ओडिशा और झारखंड के कुछ इलाकों में मनाया जाता है.

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आशा करता हूँ की यह Lok Katha Kahani आपको जरुर  पसंद आया होगा. इस तरह के  लोक कथायों को संग्रह करना  बहुत ही मुस्किल है. आदिम जन जातियों से मिलना , उनसे बात करना  उनकी कहानियों को संग्रह करना  म्हणत भरा काम है. पर इस तरह के Lok Katha Kahani को  आपके सामने  लाने के लिए प्रयास करूँगा.

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