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hindi story for kids – मानटान की कहानी

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दिल छूने वाली कहानी …. Hindi story for kids

       हरिपुर गांव में एक व्यापारी रहता था ।  उसे व्यापार करने के लिए इधर उधर का माल लाने आने  के लिए गधों का इस्तेमाल करता था । उसकी तबेले में पांच गधे रहते  थे । उसमें से तीन गधे  भार उठाने में सक्षम।

      बाकि दो गधे की छोटे बच्चे थे। दोनों बच्चों में एक बच्चा  बहुत ही बदमाश और शरारती था । किसी का बात नहीं सुनता था । हमेशा अपनी मनमानी करता था । इसलिए इसका नाम मानटान है ।

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             एक दिन की बात है, मानटान ने गुस्से में आकर बोला  – वह इस जगह रहना नहीं चाहता है । कहीं दूर जाना चाहता है । दूसरे गधे कुछ समझ नहीं पा रहे थे । दुसरे उस बातों  को न समझ पाने की कारण पुछा ।

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मानटान ने गुस्से में आकर  बोला  – “क्या तुम लोग जान नहीं पा रहे हो । यहाँ का मालिक तुम लोगों को कितना मेहनत करवाता है । लेकिन उसकी तुलना में हम लोगों को ज्यादा खाना नहीं दे रहा है ।

     वह हर दिन जो सूखा हुआ भूसी दे रहा है क्या वह किस जानवर की लायक है ? छि छि छि । खाने की बात छोडो दुर्गन्ध से नाक फटा जा रहा है । हरा मुलायम घास के बदले हमारे आगे यह सुखा हुआ पत्ति फ़ेंक देता है । खाना है तो खाओ नहीं तो जाओ ।  दिन रात इतना मेहनत  पर आराम थोडा सा भी नहीं ।  इसलिए मैं इधर से जा रहा हूँ ।  ”

      मानटान उस जगह को छोड़ ने के लिए तयार होता है की उसकी माँ बोली- “तू मुझे छोड़ के कहाँ जायेगा । तुझे ना देखूं तो में क्या जिन्दा रह पाऊँगी ।  ऐसे  नासमझ होना ठीक नहीं है । पहले मालिक को आने दो फिर हम लोग उनसे बात करेंगे ।”

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मानटान वहां से भाग निकला – hindi story for kids

       माँ की मुहँ से यह बात ख़तम हुई थी कि नहीं मानटान ने बोल – “नहीं मा में इस जगह को अभि छोड़ रहा हूँ । मैं एक मिनट भी नहीं रह सकता हूं । देखो  माँ, में न खा पीकर कितना कमजोर हो गया हूँ।”   

       इतना बोल कर खूब जोर से दौड़ने लगा ।  माँ ने जितना आवाज़ लगाया पर उसकि नजर से वह ओझल हो गया। माँ ने जितना भी ढूंढने की कोशिश की पर वह नहीं मिला । माँ का मन बहुत ही दुखी हो गया । मानटान ने दौड़कर एक मेले में पहुंच गया ।

              मेले में बहुत सारे बच्चे  नाच  गाना कर मस्तियां कर रहे थे ।  उनके पीछे पीछे  मानटान चल रहा था ।  मेले  में पहुंच कर कुछ बच्चे अपने मनपसंद की चीजें खरीद रहें थे।  मेले में मिठाईयां खाकर  मौज कर रहे थे ।

     उस समय  मानटान दुखी  मन से बैठा था । गर्मीयों के कारण चारों और घास सुख गया था । भूख प्यास से उसका पेट जल रहा था । बिच बिच में उसकी माँ की याद आ रही थी। पर क्या होगा वह रास्ता भटक गया था ।

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             इस समय एक बदमास बच्चे ने अपने पास ख़रीदा हुआ  हरा चषमा गधे के बच्चे मानटान को पहना दिया । उसके बाद  मानटान ने चारों ओर देखा । वाह ! क्या हरा घास है । उनको खाने के लिये जीभ ललचाया  ।

      उसको चारों और हरा घास दिखाई मालूम पड़ा। सामने एक नदी दिखाई दी उसका पानी  भी हरा  नजर आ रहा था । उसको घास समझ कर  खुसी से दौड़ कर नदी मैं कूद गया । वह नदी में बह गया ।  उस समय  माँ की बात याद करके आंखों में  आंसू आ गया ।

              नदी में बहते बहते  वह बहुत दूर  चला गया ।  बिच बिच में चिल्ला रहा था  बचाओ, बचाओ ।  तेज धार वजह से  उसका सर एक पत्थर से पटक गया । वह  बेहोश हो गया । नदी में बहते बहेते एक पास के गाँव  एक किनारे पास लग गया । 

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राधा ने मानटान की जान बचाई – hindi story for kids

      बेहोस पड़ा था । गाँव की कुछ छोटी लड़कियां पानी लेने के लिए  नदी के पास जा रही थी की उनको गधे की बच्चे को बेहोसी की हालात में पड़ा हुआ मिला ।  लड़कियों की बिच बात चित।

                   एक लड़की ने कहा  – “अरे ओ राधा देखो जरा यह गधे का बच्चा  मरा है या जिन्दा है।”  राधा ने उसे उठाया और देखा की  गधे का बच्चा  बेहोस पड़ा है। वह उसको घर ले आया ।  उसको होश में लाने की कोशिश की । 

      उसकी पेट में से पानी निकाला । पानी ठंडा होने के कारण उसका शरीर ठंडा हो गया था । इसलिए राधा ने आग जलाई । राधा ने जोर शोर से उसकी हात पैर पर मालिश किया तो वह होश में आया ।

                मानटान जोर से  माँ माँ चिल्लाने लगा । और खड़े होने की कोशिश की पर कमजोरी के कारण  हो न सका।

       “चुप हो जाओ तुम्हें कुछ नहीं होगा  में तुम्हारे  पास हूँ ” एसा कह कर उसको सहलाने लगीं । खाने के लिए  कुछ बचाकूचा रोटी दी । कुछ दाना भी दिया और कुछ हरे घास।

              रात गुजर जाने की बाद अगले दिन सुबह  मानटान  एक दम से ताजा हो गया ।  मानटान कुछ दिनों में सबसे घुल मिल गया ।  राधा  जहाँ जहाँ जाती थी मानटान  उसकी पीछे पीछे जाता था । उसकी साथ खेला कूदा करता था ।

        मानटान  अब धीरे धीरे बड़ा होने लगा । वह अपने माँ को भूल गया । राधा के सारे  काम करता था । जैसे पानी लाना, जंगल में लकड़ी  लाना । बाज़ार से  सामान लाना । राधा को पीठ पर  घुमाने ले जाना , यहाँ तक की स्कूल  लाने आने में उसका साथ देता था ।

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              इक दिन राधा ने मेले में जाने की जिद पकड़ी ।  राधा के पिताजी उन दोनों को मेले घुमाने के लिए ले गए ।  राधा ने मेले में खूब घुमा । ढेर सारा खिलौना लिया । मिठाइयाँ खाई और  मानटान को  भी दिया ।

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मानटान और माँ का मुलाकात –  hindi story for kids

     मानटान खुस हो गया । मेले में काफी देर हो गया । अब सब घर जाने की तैयारी कर रहे थे ।  तभी मानटान की नजर एक बूढी गधी के ऊपर पड़ी ।

              मानटान उसको पहचान गया वह कोई और नहीं थी उसकी माँ थी ।  वह दौड़ा और माँ, माँ  चिल्लाने लगा । वह सीधे जाकर माँ के पास पहुंचा  और बोला  क्या  तुम मुझे पहचान सकते हो । मैं तुम्हारा बेटा मानटान हूँ ।

              मानटान तुम लौट आये। तू कहाँ चला गया था बेटा  में तुझे पागलों की तरह ढूंढ रही  थी । कितने साल  बीत गये ।  मेरा बेटा मेरा लाल । अब  मुझे छोड़ के नहीं जाओगे ना । रोती हुई माँ ने बोली ।

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               नहीं माँ  में तुझे कभी नहीं छोड़ के जाऊंगा । तू  चल मेरे साथ दुसरे गाँव। मैं तेरा अच्छे से खयाल रखूँगा ।  तुझे कोई भी काम करने नहीं दूंगा । तू चल माँ ।  तू जानता है माँ राधा के बजह से  मेरी जान बच गयी । उसने मेरी बहुत इलाज और सेवा की । जिसकी बदौलत में तुम्हारे पास हूँ ।

              माँ ने गहरी सांस लेकर बोली वही  तो मुश्किल बात है बेटा । हम अपने अपने मालिक के शुक्र गुजार हैं ,  हमें खाना पीना वही देता है बदले में हम से थोड़ा बहुत काम करवाता है। जिन्दगी तो कर्म करने के लिए है ।

   जितनी मेहनत करोगे उतना  आगे बढोगे । में बूढी हो गयी हूँ, में और  कितना दिन जियूंगी । तू उन लोगों के साथ चला जा  तेरे पास सारी जिन्दगी पड़ी है । जी ले अपनी जिंदगी । कर्म करते रहना ।

       “पर माँ …..”  मानटान को बीच में से  टोकते हुए कहा  पर वर कुछ नहीं राधा तुम को बुला रही है । जाओ  उसके साथ और माँ की कहे हुए बात याद रखना ।

   उधर मानटान को पुकारती हुई  राधा आयी । – मानटान, ओ मानटान किधर हो तुम  मैंने तुम्हे कहां कहां नहीं ढूंढा ?  घर जाने का समय हो गया है।  चलो चलते है ।

मानटान ने मेहनत किया -hindi story for kids

माँ  की बातों को याद करके  मानटान ने अगले दिन ही खूब मेहनत  करना शुरू कर दिया। पहले तो नदी से  दो बाल्टी पानी लाता था, लेकिन अब  चार चार बाल्टी एक साथ लाद कर पानी ले आता है।

     जंगल से  बहुत सारे लकड़ियां ले आता है । बहुत सारे बोझ उठाकर बाज़ार जाता है । और खूब सारे पैसे लाता है । यह सब राधा के पिता श्यामलाल देख कर खुश हो गये। और  सोचा मानटान को अगले साल दुसरे गाँव में गधों का मुकाबला  में हिस्सा लेना होगा। शायद वह जीत जाए ।  यह सोच कर अगले साल  के लिए मानटान को तैयार करने के लिए जुट गये ।

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मानटान की जित हुई – hindi story for kids

       देखते ही देखते एक  साल बीत गया । गधों का मुकाबला शुरू हो गया। मानटान ने खूब मेहनत  की और सबको पछाड़ कर प्रथम स्थान पर जीता । यह देखकर राधा और श्यामलाल खुश हो गये। मेले में मानटान की माँ भी आई हुई थी ।

     उसने मानटान के कारनामे देखकर, बहुत खुश थी । माँ ने  मानटान के पास पहुंचा  उसको बधाई देने लगीं ।  और बोली – “मुझे तुम पर गर्व है। ऐसे ही मेहनत करते रहना अपना  नाम रोशन  करना” । ऐसा कह कर  मानटान को गले लगाया ।

 मानटान ने बोला – “ माँ, तुम अगर रास्ता दिखाया नहीं होता तो मैं यहाँ तक कभी नहीं पहुंच पाता । मेरे जित का असली हक़दार तुम हो माँ ।” माँ ने यह बात सुनकर खुशी से रोने लगी ।

       राधा  ने  यह  सब दूर से देख रही थी उसे मालूम हो गया की मानटान जिससे बात कर रहा है वह कोई और नहीं उसकी माँ है । राधा ने मानटान की जीते  हुए पैसे  से  मानटान की माँ को खरीद लिया ।

    मानटान का खुशी का ठिकाना नहीं रहा । मानटान ने राधा को धन्यवाद जताया । मानटान उसकी माँ, राधा  और  श्यामलाल  इन चारों खुसी खुसी  अपने घर को शाम होते ही लौट गये ।

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Best hindi story Saap aur Lakdi Chor – सांप और लकड़ी चोर

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Best hindi story सांप और लकड़ी चोर

रामपुर नाम का एक छोटा सा गांव था। वह गांव देखने में बहुत खूबसूरत है। गांव के चारों ओर बड़े-बड़े पहाड़ है। यह गांव घने जंगल से घिरा हुआ है। और गांव के पूर्व हिस्से में एक तालाब में कमल फूलों से भरा है।

उस गांव में कई समुदाय के लोग रहते हैं। वे दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर के अपना जीवन यापन करते हैं।

एक दिन की बात है। उस गांव में दो सपेरे आए सांप का खेल  दिखाने के लिए । उन्होंने सांपों को गांव के बीच में रखा और लोगों को दिखाया। जब लोग सांप देखते हैं तो उन्हें पैसे मिलते है।

वे अपने टोकरी में कई तरह के सांप रखते हैं। ये कई प्रकार के होते हैं जैसे नाग, अहिराज, अजगर। उन सांपों में अजगर सबसे बड़ा है। उस सांप को देखकर हर कोई हैरान और डर जाता है। वे सपेरों ने एक सप्ताह तक वहीं रहें।

उस गांव में, दिलीप बाबु शहर से आये थे और एक कॉफ़ी बगीचा लगाया और वहीं रहने लगे। उन्होंने सपेरों से बात की । बातचीत के बीच में उन्होंने पूछा कि सपेरों का घर कहां है? उन्होंने कहा कि उनका गांव मणिपुर है। दिलीप बाबु के पिता का घर भी मणिपुर है ।

लेकिन उनकी पढ़ाई शहर में हुई। ये  सुनकर दिलीप बाबु बहुत खुश हुए। दिलीप बाबु एक अच्छा इंसान, दयालु, सच्चा, ईमानदार और उदार व्यक्ति हैं। उन्होंने  उन सपेरों को गांव की छोटी सी दुकान से कुछ सस्ते दाम पर सामान खरीद के दिया। सपेरें बहुत खुश हो गये।

दिलीप बाबु ने उन सपेरों से सांपों को लाकर उनके घर के पास दिखाने को  कहा। सपेरों ने जाकर उन्हें एक-एक करके दिलीप बाबू को सांप दिखाया। सांप को देखकर वह खुश हो गये। इस समय के दौरान  एक आदमी उन के पास आया और उन्होंने मजाक में कहा “सांप अकेले देख रहें हैं। क्या आप सांप खरीदेंगे?” दिलीप बाबू ने मजाक करते हुए कहा, “हां, मैंने खरीद लिया।” आदमी हैरान हो गया।

उन्होंने कहा, “क्या यह सच है, दिलीप बाबु ?” दिलीप बाबु ने कहा, “हां, यह सच है।”

“किस सांप को”? आदमी ने कहा। दिलीप बाबु ने कहा ‘अजगर सांप’।

तब वह आदमी हैरान हो कर दौड़ा। गांव में चिल्लाकर कहा कि “दिलीप बाबु ने सांप खरीद लिया ।” । गांव के लोग आश्चर्यचकित हो गये।

गांव वालों ने पुछा दिलीप बाबु क्या आपने सांप ख़रीदा है और क्या करेंगे उस सांप को ? दिलीप बाबु ने कहा में उस सांप को बगीचे में छोडूंगा।

गांववालों चिंतित थे। क्योंकि वे बगीचे में लकड़ी, पत्ते, फल, फूल आदि चुरा लेते थे, अब ऐसा नहीं हो सकेगा ! जल्द ही यह कहानी गांव भर में फैल गई।

यह बातें सबके कानों में पड़ा। हर कोई डर गया था। और कोई बगीचे में नहीं गया। इसके बाद फूल सुरक्षित रहे। लेकिन दिलीप बाबु के पिता का नौकर रामू काका इन सब बातों के बारे में जानते थे। ऐसे ही कुछ दिन बीत गए।

गांव वाले कभी-कभी रामू काका से पूछते हैं, “सांप क्या खा रहा है?”  रामू काका कहते है कि वह एक ही समय में दो मुर्गी के अंडे निगल रहा है और वापस बगीचे में चला जाता है ! वहीं एक अन्य व्यक्ति पूछता है, “क्या सांप खाली बगीचे में रहेगा?” रामू काका कहते हैं, “हां, रहेगा, वह एक मंत्र तंत्र से बंधा हुआ है।“

रामू काका ने फिर कहा “अभी सांप छोटा है। अगले दो महीनों में वह बड़ा हो जाएगा और बड़े-बड़े लोगों को भी खा जाएगा।“ इससे लोग ज्यादा डर गये।

लोगों को बहुत दुःख होता है। क्योंकि लोग बगीचे में जाकर पत्ते, फल और फूल नहीं ले सकते।

रामू काका कोई अच्छा काम नहीं कर रहे थे। देर से काम पर आते हैं और जल्दी चले जाते हैं। यह देख कर दिलीप बाबु ने एक दिन रामू काका को काम पर न आने को कहा।

Best hindi story में रामू काका ने गांव वालों से क्या कहा?

रामू काका बहुत दुखी हुए, उसने गांव में जाकर गांव वालों से कहा कि सांप को छोड़ने की बात झूठ है। गांव वाले इसे झूठ समझकर रोज बगीचे में जाते थे। एक दिन पांच लोग रात को बगीचे में गये और सोचा कि ‘पेड़ काटकर लाया जाए।’

वे सभी पेड़ को काटने में व्यस्त थे। धीरे-धीरे एक अजगर सांप आया और एक के पैर को दबोच लिया। आदमी ने जोर से चिल्लाया। रात में किसी को कुछ नजर नहीं आता। हर कोई उसके पास पूछने के लिए दौड़ा कि क्या हुआ ! आदमी सांप सांप चिल्लाता है ।

रात के समय कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने जाकर सांप को कुल्हाड़ी से घायल कर दिया। सांप उस आदमी को छोड़ दिया। फिर भी वह आदमी सांप सांप चिल्ला रहा था। उसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। उन्होंने सोचा, “हम चोरी करने क्यों गये थे।”

लकड़ी चोरों ने वहाँ से लौट कर रामू काका को पीटने लगे। चोरों ने पूछा, “रामू काका ने सांप न होने के बारे में झूठ क्यों बोला?” यह सुनकर रामू काका आश्चर्यचकित रह गये ! मैंने गांव वालों को अपने मालिक के नाम से क्यों झूट बोला?

रामू काका रात में धीरे-धीरे दिलीप बाबु के घर गये और दरवाजा  खटखटाये। दिलीप बाबु उठे और दरवाज़ा खोला! रामू काका “तुम्हें क्या हुआ”? रामू काका ने सब कुछ कहा। दिलीप बाबु ने मन में सोचा, ‘ईश्वर जो करते हैं वह प्राणियों के कल्याण के लिए करते हैं’ और घर के अंदर चले गए।

तब गांव के लोगों ने यह निर्णय लिया कि “वह किसी की बगीचे से कुछ नहीं चुराएंगे ।” जो मेहनत की कमाई होगी, वही खा कर खुश रहेंगे।”

उस दिन से रामपुर गांव में कुछ भी नहीं खोया। सभी खुश थे।

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Satya Yug ki Kahani – सत्य युग की कहानी

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Satya Yug ki Kahani – सत्य युग की कहानी  :  यह कहानी सत्य युग की समय का है । पुराण युग के बारे में सुनकर हमें जितनी खुशी होती है उतनी ही हैरानी भी होती है। अतीत में, पहाड़ों के पंख होते थे। यह एक कहानी बताता है कि यह अब कैसे गायब हो गया है।

एक बार ब्रह्मा आसन पर बैठे हुए नरलोक के बारे में सोच रहे थे। इसी समय नारद ने ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। वह ब्रह्मा जी के पास गये और बोला, “पिताजी! मेरा प्रणाम स्वीकार करें।”

ब्रह्मा जी  ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “बस! आने का अभिप्राय क्या है ?” नारद जी ने कहा, “भगवान्, आप सृष्टि के रचयिता हैं, लेकिन इस सृष्टि में कुछ अपवाद भी हैं, जो बहुत कुरूप हैं।”

नारद की यह बात सुनकर ब्रह्मा जी थोड़ा परेशान हुए और बोले, ‘बताओ वह क्या है?’ जब सृष्टि प्रारम्भ हुई तो कौन कहाँ रहेगा इसकी सूची तैयार करने के लिए विश्वकर्मा को देवलोक, नरलोक और पाताललोक भेजा गया था।”

ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर नारद जी बोले- “मैं उस सूची के बारे में बात करने नहीं आया हूँ।”

एक दिन मैं नरलोक गया और वहां जो कुछ हुआ उसे देखकर कोई एक क्षण भी नहीं रुक सकता। यह सुनकर ब्रह्मा जी बोले, ‘क्या समस्या है बताओ, उसका निवारण किया जाएगा।’

नारद जी ने कहा, भगवन्! इतनी बड़ी-बड़ी कठोर चट्टानों और पेड़ों से युक्त पहाड़ों के शरीर पर पंख लगे हुए हैं, इसलिए वे उड़ रहे हैं और गाँवों और कस्बों पर बैठ रहे हैं। यह सब कुछ नष्ट कर देता है ।

एक दिन जब मैं आकाश की ओर जा रहा था तो एक पहाड़ उड़ता हुआ आया और मुझ  से टकरा गया। नतीजा यह हुआ कि मैं बेहोश हो गया ।

मैं कैलाश पर्वत पर जा गिरा । उस दौरान शिव जी तपस्या में बैठे थे। शिव जी ने अपनी तपस्या पूरी की और कमंडल पानी से मुझे बचाया।

Satya Yug ki Kahani में ब्रम्हा जी ने क्या किया

तब ब्रह्मा जी ने कहा, ‘क्या आप जानते हैं कि पर्वत को पंख क्यों दिए गए थे? लोगों की भलाई के लिए काम करने को पंख दिये गये. जब एक क्षेत्र के लोगों ने घर बनाने के लिए उस पहाड़ से पत्थर, लकड़ी, मिट्टी और शरीर के लिए औषधीय जड़ी-बूटियाँ ले जाने से लाभ उठाया जा सके। उन्होंने वह स्थान छोड़ कर  और अन्य लोगों की मदद करने के लिए जाते थे ।  लेकिन ये तो बेतरतीब से घूम रहे हैं।’

यह सोचकर ब्रह्मा जी को कोई और रास्ता नहीं सूझा। उन्होंने तुरंत इंद्र को बुलाया और कहा, “तुम वज्र मार के पर्वतों के पंख काट दो।”

ब्रह्मा की यह बात सुनकर इन्द्र ने वज्र से पर्वतों के पंख काट दिये। उस दिन से वे कहीं और उड़ नहीं सके।

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Best Moral Hindi Story Santon ki Pariksha – संतों की परीक्षा

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Best Moral Hindi Story-संतों की परीक्षा –   बहुत पुरानी कहानी है। देवपुरी राज्य में एक आश्रम था। उस आश्रम में तीन साधु रहते थे। पहले संत का नाम संत रामदास था। दूसरे संत का नाम संत रामेश्वर  और तीसरे का नाम संत चिदानंद था।

संत रामदास और संत रामेश्वर हमेशा झगड़ते रहते थे। संत रामदास कहते थे कि वे सर्वश्रेष्ठ संत हैं। संत रामेश्वर भी कहते थे कि वे सर्वश्रेष्ठ संत हैं। लेकिन साधु चिदानंद उन्हें हमेशा समझाते थे। वे कहते थे कि इस संसार में संत ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

यह सुनकर संत रामदास और संत रामेश्वर हंस पड़े और बोले – ‘क्या बात कर रहे हो चिदानंद? यदि आप अपने नाम के आगे संत शब्द लगाएंगे तो क्या आप हमारे जैसे संत हो सकते हैं? स्वयं को धार्मिकता सिद्ध करना आपकी कमजोरी है। दोनों संतों की बातें सुनकर संत चिदानंद ने कहा- ‘संत बनने के लिए ‘साधु’ शब्द का प्रयोग ही काफी नहीं है। अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा और सही कर्तव्य ही धर्म है।

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तीनों संतों की बातें स्वयं भगवान विष्णु ने सुनीं। एक दिन भगवान विष्णु तीनों संतों की परीक्षा लेने के लिए देवपुरी आश्रम में आये। भगवान स्वयं सामान्य रीति से आश्रम में आये।

उन्होंने कहा- मैं दिशाहीन पथिक हूँ । रास्ता भटक गया हूँ और इस आश्रम में पहुंच गया। तीनों ऋषियों ने कहा-यह हमारा सौभाग्य है। सेवा ही हमारा धर्म है। तुम आओ अपने हाथ-पैर धो लो और थोड़ा ठंडा पानी पी लो। तुम आराम महसूस करोगे।

संत रामदास पथिक को वापस अपनी कुटिया में ले गये। भगवान विष्णु ने कुछ देर वहीं विश्राम किया। तब संत रामदास ने कहा- पथिक महोदय, आपको भूख लगी होगी। हमारे आश्रम में तीन आम के पेड़ हैं और वह बहुत मीठे हैं। आइए भूख मिटाने के लिए आम खाएं।

तीनों संत और पथिक आश्रम के बगीचे में पहुंचे। संत रामदास एक बड़ा बांस लेकर आए और अपने आम के पेड़ की शाखाओं को पीटने लगे। पेड़ से आम गिरने लगे। पथिक ने एक आम उठाकर खाया और बोला- आप मेरे लिए मेहनत से आम तोड़े लेकिन आप के  पेड़ के आम इतने मीठे नहीं लगे।

तभी संत रामेश्वर एक बड़ी रस्सी लेकर आए और आम के डालीयों फांद कर वह उस रस्सी से अपने पेड़ की शाखाओं को हिलाने लगे। आम झड़ने लगे। पथिक ने आम उठाकर खा लिया। उसने कहा- मैं यह आम नहीं खा सकता। ये आम भी उतना मीठा नहीं है।

तब साधु चिदानंद अपने आम के पेड़ के पास गये। बड़ी कठिनाई से आम के पेड़ पर चढ़े। कुछ देर बाद अच्छे अच्छे  दो आम लेकर आम के पेड़ से नीचे उतरे।

संत रामदास और संत रामेश्वर ने उनसे कहा- तुम कितने मूर्ख हो। पथिक को आम खिलाने के लिए इतना समय लगा दिया ।  साधु चिदानंद ने कहा- यह आम का पेड़ मैंने अपने हाथों से लगाया है। मैं इसे आपकी तरह बांस से पिट पिट कर कष्ट देना नहीं चाहता था। एक को कष्ट देकर दूसरे को ख़ुशी नहीं दी जा सकती। और मैं अपने पेड़ का गला रस्सी से नहीं घोंट सकता। वह ऐसे दर्द देने की बजाय मेहमान को पानी पिलाकर संतुष्ट करना चाहिए । मैं स्वयं आम के पेड़ पर चढ़ गया और दो पके आम ले आया।

आम पथिक को जरूर खाने चाहिए। भगवान विष्णु ने दो आम खाये। उसने कहा- इस आम के पेड़ के आम बहुत मीठे हैं। ऐसा आम मैंने पहले कभी नहीं खाया। आप सचमुच महान हैं। दयालु चिदानंद ने यह सुने और संत रामदास और संत रामेश्वर बहुत क्रोधित हुए।

उन्होंने कहा- हे पथिक! हमारे पेड़ के आम भी कम मीठे नहीं हैं । आप संत चिदानंद की अनावश्यक प्रशंसा करते हैं और हमारा अपमान करते हैं। आपका पक्षपातपूर्ण व्यवहार पूर्णतः अस्वीकार्य है।

भगवान विष्णु जी अपने मूल स्वरुप में आये  (Best Moral Hindi Story)

उसके बाद पथिक अपने मूल स्वरूप में आ गये। भगवान विष्णु स्वयं तीनों संतों के सामने प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने कहा- हे मुनियों! मैंने आपकी सारी बातें सुनीं। मुझे आपकी विवेकशीलता का परीक्षण करने में रुचि है। और मैं पथिक के भेष में तुम्हारी पवित्रता की परीक्षा लेने आया था। मैं आपकी सेवा से संतुष्ट हूं।

लेकिन रामदास और रामेश्वर संत बनने के योग्य नहीं हैं। तुम्हारे हृदय में दया नहीं है। केवल ईर्ष्या और निंदा से भरा हुआ है। लेकिन संत दयालु चिदानंद में असीम दया और प्रेम है। वह पेड़ों को वैसे ही देखता है जैसे वह मनुष्य को देखता है। मैं सब के शरीर में विद्यमान हूं।

जब रामदास ने आम के पेड़ को बांस से पीटा  मेरे शरीर पर बहुत सारे घाव हो गये जिससे मुझे बहुत दर्द हुआ था। आम इतने मीठे नहीं लगे। उसी प्रकार मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे रामेश्वर मेरी गर्दन में रस्सी डालकर और आम के पेड़ को खींचकर मेरा गला घोंट रहा है। लेकिन फिर, जब साधु चिदानंद एक पेड़ पर चढ़ गए और मेरे लिए दो पके आम लाए, तो मेरे शरीर को कोई नुकसान नहीं हुआ। वह न तो लालची है और न ही हिंसक। पेड़ के प्रति उसका स्नेह और प्रेम अनंत है ।

दयालु चिदानंद की ऐसी सेवा से, मैं आपके द्वारा उत्पन्न सभी कष्टों को दूर करने में सक्षम हो गया। तब भगवान विष्णु ने कहा- केवल संत चिदानंद ही संत पद के पात्र हैं। सिर्फ संत शब्द लगा देने से कोई संत नहीं हो जाता। संत बनने के लिए सबसे पहले मन और हृदय में दया, प्रेम और सेवा भाव का होना जरूरी है, जो संत चिदानंद के शरीर में कूट-कूट कर भरा है।

इसलिये आज से संत दयालु चिदानंद  जिन्दगी भर  संत रहेंगे और आप दोनों संत दयालु चिदानंद के सेवक रहेंगे। यह सुनकर रामदास और रामेश्वर को अपनी गलती का एहसास हुआ। भगवान विष्णु ने उन्हें क्षमा प्रदान कर दी। उन्होंने प्रभु की शरण ली। अपने शेष जीवन में, संत चिदानंद ने दुनिया की भलाई के लिए काम किया।

 

इस कहानी की शिख – एक को  कष्ट देकर दुसरे को  ख़ुशी  नहीं दी जा सकती ।  हमेशा अपने मन में दया का भाव रखना चाहिए , तभी तुम अच्छे इन्सान बन पाओगे ।

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