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akbar birbal ki kahani – अकबर और बीरबल की मुलाकात

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Akbar aur Birbal ki kahani

Akbar Birbal ki Kahani  – पहला भाग

     Akbar Birbal ki Kahani –  एक  बार  की  बात  है, बादशाह  अकबर अपने दरबारियों  के साथ शिकार के लिए जंगल निकल गए। वे शिकार खेलते खेलते  अपने राजमहल से बहुत आगे  निकल गए । उस दिन  अकबर  की चाल थोड़ी धीमी थी।

     उनके कुछ दरबारी तेज थे उनसे आगे निकल गये। बादशाह अकबर अपने  कुछ  दरबारियों  के साथ  पीछे रह गये । शिकार तो नहीं मिला पर रास्ता भटक गए। धीरे धीरे सूरज डूब रहा था  और वे महल  तक  जाने का रास्ता  भूल  गए। वे सभी जंगल से  बहार आने की कोशिस कर रहे थे।  तब तक, सबको भूख और प्यास से  पेट में चूहे कूद रहे थे।

Akbar aur Birbal ki kahani - akbar in jungle

Akbar aur Birbal ki kahani – akbar in jungle

      कुछ देर बाद, उन्हें जंगल में एक रास्ता दिखाई दिया । बादशाह अकबर और  साथ चल रहे दरबारि तेजी से  उस रास्ते  की और  बढ़ने लगे।  उनको लगा कि  वे सभी  बड़े आसानी से  राजमहल पहुँच जायेंगे।

     जब वे लोग  आगे बढ़ रहे थे  तो देखा की  वह रास्ता  अलग तिन  रास्तों में बंट रहा था। तो उनके होंस उड़ गये और आपस में बहस करने लगें की उन्हें किस रास्ते से जाना ठीक होगा।

        बादशाह अकबर भी परेशान  हो  गए और अपने आप से बोले  , में  कैसे  पता लगाऊं की  महल  की  और कौन सा रास्ता जाता है। मेरे साथ  मेरे राजदरबारी मित्र भी भूखे  और प्यासे  है।  अरे कोई तो उपाय बताओ। हमें किसी भी तरह महल पहुँचना होगा।

       तभी एक आदमी लकड़ी काट कर अपने  घर को जा रहा था। बादशाह अकबर उसे अपने पास बुलाया और बोला  – “अरे ओ लकड़ी वाले सुनोतो जरा, मुझे ए बताओ की  इनमैं  से  कौन सा रास्ता  महल की तरफ ले जाएगा।“

      उस आदमी ने थोड़ा मुस्कुराते  हुए जवाब दिया की – “हुजुर कोई भी रास्ता महल या किसी भी जगह कैसे ले जा सकता है।“ अकबर यह सुन कर बहुत हैरान और परेशान  हो गये । उस आदमी ने बोला “यह  तो मालूम है कि रास्ते कहीं नहीं जाते।“ अब अकबर को  उसका  मजाक  समझ आया और  वे  अपने  दरबारियों के साथ  मिल कर हंसने लगे। 

Akbar meet Birbal

Akbar meet Birbal

      मजाक  तो ठीक था पर  महल  जाने का रास्ता  अब तक पता नहीं चला था। उस आदमी ने  बड़े  ही आदर  से  कहा ,  “हम  लोग  ही  एक जगह से दूसरी जगह पर आ जा सकते हैं, रास्ते  ऐसा  काम  नहीं  कर सकते।”

     बादशाह अकबर समझ  गए  की  यह आदमी  मजाक में  भी  सच्चाई थी  उन्होंने  उससे  कहा ,  “हाँ में मानता हूँ  की  तुम जो  बोल रहे हो वह ठीक है।”

अकबर ने पुछा  “तुम्हारा नाम क्या है?” आदमी ने बोला  “हुजूर मेरा नाम  महेश  दास भट्ट है” आदमी ने फिर से पूछा “आप कौन है ? इससे पहले आपको पहले कभी नहीं देखा है।“

बादशाह अकबर ने उसको कहा  – “मैं हिंदुस्तान का शहंशाह  बादशाह अकबर हूँ”

फिर उन्होंने अपनी अंगूठी  देते हुए कहा,  “ये लो,  मेरी अंगूठी रखो । तुम बहुत  ही अक्लमंद और अनोखे  इंसान हो। मुझसे मिलने दरबार जरूर आना । इस अंगूठी को देख कर पहचान  लूँगा।”

    महेस भट्ट अंगूठी को लेते हुए बोला  “बहुत बहुत  मेहरबानी । में बहुत  खुद किस्मत इंसान  हूँ जो आप से मुलाकात हुई।”

      बादशाह अकबर बोले “अब मुझे  महल जाने का रास्ता बता दो, मुझे  अपने  महल  जल्दी वापिस  पहुँचना है।“  महेश ने  खुसी खुसी  अकबर से अंगूठी का उपहार लेकर धन्यवाद  दिया  और उन्हें महल जाने का रास्ता भी बता दिया।

Akbar Birbal ki Kahani  – दूसरा  भाग

    जब अकबर महेश दास को वह अंगूठी  देकर  चले गये  तो वह अक्सर उसे  उलट-पलट कर देखा करता था। उसे अच्छी तरह  याद था  की अकबर ने दरबार  में  अंगूठी  की निशानी दिखा  कर मिलने के लिए कहा था।

     वह पहले कभी महल नहीं गया था और न ही वहां किसी  को जानता था। परन्तु एक दिन, महेश दास ने तय  कर  लिया  की  वह  अकबर से मिलने जाएगा। उसने महल जाने के लिए अपना सामान  बांधा और  राज महल के लिए  रवाना हो गया ।

जब वह महल पहुंचा तो एक दरवान ने  दरबार में  जाने से  पहले ही रोक लिया। महेश ने उसे बादशाह अकबर की दी हुई अंगूठी दिखाई।

Birbal meet security guard

Birbal meet security guard

      महेश ने बोला –“भाई ! मुझे बादशाह अकबर ने मिलने लिए बुलाया है। यह  देखो उनकी दी हुई अंगूठी। निशानी की तौर पर मेरे पास है। ”

        अंगूठी को देखकर दरबान का लालच  जाग उठा। उसने कहा। – “सुनो भाई, में तुम्हे एक शर्त पर दरबार में  जाने दूंगा।” ठीक है, अपनी शर्त बताओ। “ महेश बोला।

        दरबान ने कहा –“अगर तुम्हें बादशाह अकबर से भेंट करने के बाद कोई भी इनाम  मिला  तो तुम्हें उसमें से आधा हिस्सा  मुझे  देना  होगा।”

महेश  दरबान  की बात  सुनकर हैरान  रह गया  पर  उसने  लालची दरबान  की शर्त  मान ली।

         महेश दरबार में पहुंचा तो अकबर का  दरबार लगा हुआ था  महेश दरबार और महल की सुंदरता देख मोहित हो गया । सारे दरबारी अपने अपने स्थान पर बैठे थे। दरबार की शोभा निराली थी।

“तुम कौन हो नौजवान ? यहाँ क्या करने आये हो?” बादशाह ने पुछा।

           “जहांपनाह ! मैं महेश दास हूँ । आपने ही  मिलने के लिए  बुलाया था।” महेश ने जवाब दिया। जब  बादशाह अकबर को कुछ  याद  नहीं  आया तो उसने  उन्हें  वह अंगूठी  दिखाई  और जंगल  में  रास्ता  भटकने  वाली  बातें  याद दिलाई।

            उस अंगूठी को देखते ही  अकबर को  सारी बातें याद आ गया। उन्होंने महेश को पास बुलाया।  उन्हें  महेश  दास  को  अपने सामने  देख कर बहुत खुश हुए । बादशाह ने  खुश होकर  कहा “ जो  तुम्हारे जी में  आए, वह  इनाम  मांग लो।”

        महेस ने दरबान की बात भूली नहीं थी, उसने कहा  “जहांपनाह मुझे बीस कोड़े  लगवाए जायें”। यह सुनकर   दरबार  में  सभी  हैरान  रह गये । अकबर जानते थे  की  महेश  की इस  बात  में  भी कोई  राज  छिपा था। उन्होंने  दरबारी  से  महेश  की  इच्छा  पूरी  करने  को कहा।

        जब  महेश को  दस  कोड़े  लग गये  तो  उसने  दरबारी  से  रुकने  को कहा । फिर  उसने  दरबान  वाला  किस्सा  सबको सुना दिया। यह  सुन कर अकबर को बहुत गुस्सा आया और लालची दरबान को दरबार में  हाजिर  होने का  हुक्म  दिया गया।

birbal meet akbar

birbal meet akbar

     अकबरने  दरबान  को  पचास  कोड़े  मारने का आदेश दिया।  उसे  तिन साल तक कैद में रखने का आदेश दिया ।

         अकबर ने  महेश दास को  समझदारी  से  खुस  हो कर  उसे  अपने यहाँ  दीवान बना दिया और बीरबल के नाम से  पुकारने लगे। दरबान  को  अपने लालच का फल  मिला और महेश दास,  बीरबल  के  नाम से  लोकप्रिय  हो गये ।

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Best hindi story Saap aur Lakdi Chor – सांप और लकड़ी चोर

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best hindi story saap aur chor

Best hindi story सांप और लकड़ी चोर

रामपुर नाम का एक छोटा सा गांव था। वह गांव देखने में बहुत खूबसूरत है। गांव के चारों ओर बड़े-बड़े पहाड़ है। यह गांव घने जंगल से घिरा हुआ है। और गांव के पूर्व हिस्से में एक तालाब में कमल फूलों से भरा है।

उस गांव में कई समुदाय के लोग रहते हैं। वे दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर के अपना जीवन यापन करते हैं।

एक दिन की बात है। उस गांव में दो सपेरे आए सांप का खेल  दिखाने के लिए । उन्होंने सांपों को गांव के बीच में रखा और लोगों को दिखाया। जब लोग सांप देखते हैं तो उन्हें पैसे मिलते है।

वे अपने टोकरी में कई तरह के सांप रखते हैं। ये कई प्रकार के होते हैं जैसे नाग, अहिराज, अजगर। उन सांपों में अजगर सबसे बड़ा है। उस सांप को देखकर हर कोई हैरान और डर जाता है। वे सपेरों ने एक सप्ताह तक वहीं रहें।

उस गांव में, दिलीप बाबु शहर से आये थे और एक कॉफ़ी बगीचा लगाया और वहीं रहने लगे। उन्होंने सपेरों से बात की । बातचीत के बीच में उन्होंने पूछा कि सपेरों का घर कहां है? उन्होंने कहा कि उनका गांव मणिपुर है। दिलीप बाबु के पिता का घर भी मणिपुर है ।

लेकिन उनकी पढ़ाई शहर में हुई। ये  सुनकर दिलीप बाबु बहुत खुश हुए। दिलीप बाबु एक अच्छा इंसान, दयालु, सच्चा, ईमानदार और उदार व्यक्ति हैं। उन्होंने  उन सपेरों को गांव की छोटी सी दुकान से कुछ सस्ते दाम पर सामान खरीद के दिया। सपेरें बहुत खुश हो गये।

दिलीप बाबु ने उन सपेरों से सांपों को लाकर उनके घर के पास दिखाने को  कहा। सपेरों ने जाकर उन्हें एक-एक करके दिलीप बाबू को सांप दिखाया। सांप को देखकर वह खुश हो गये। इस समय के दौरान  एक आदमी उन के पास आया और उन्होंने मजाक में कहा “सांप अकेले देख रहें हैं। क्या आप सांप खरीदेंगे?” दिलीप बाबू ने मजाक करते हुए कहा, “हां, मैंने खरीद लिया।” आदमी हैरान हो गया।

उन्होंने कहा, “क्या यह सच है, दिलीप बाबु ?” दिलीप बाबु ने कहा, “हां, यह सच है।”

“किस सांप को”? आदमी ने कहा। दिलीप बाबु ने कहा ‘अजगर सांप’।

तब वह आदमी हैरान हो कर दौड़ा। गांव में चिल्लाकर कहा कि “दिलीप बाबु ने सांप खरीद लिया ।” । गांव के लोग आश्चर्यचकित हो गये।

गांव वालों ने पुछा दिलीप बाबु क्या आपने सांप ख़रीदा है और क्या करेंगे उस सांप को ? दिलीप बाबु ने कहा में उस सांप को बगीचे में छोडूंगा।

गांववालों चिंतित थे। क्योंकि वे बगीचे में लकड़ी, पत्ते, फल, फूल आदि चुरा लेते थे, अब ऐसा नहीं हो सकेगा ! जल्द ही यह कहानी गांव भर में फैल गई।

यह बातें सबके कानों में पड़ा। हर कोई डर गया था। और कोई बगीचे में नहीं गया। इसके बाद फूल सुरक्षित रहे। लेकिन दिलीप बाबु के पिता का नौकर रामू काका इन सब बातों के बारे में जानते थे। ऐसे ही कुछ दिन बीत गए।

गांव वाले कभी-कभी रामू काका से पूछते हैं, “सांप क्या खा रहा है?”  रामू काका कहते है कि वह एक ही समय में दो मुर्गी के अंडे निगल रहा है और वापस बगीचे में चला जाता है ! वहीं एक अन्य व्यक्ति पूछता है, “क्या सांप खाली बगीचे में रहेगा?” रामू काका कहते हैं, “हां, रहेगा, वह एक मंत्र तंत्र से बंधा हुआ है।“

रामू काका ने फिर कहा “अभी सांप छोटा है। अगले दो महीनों में वह बड़ा हो जाएगा और बड़े-बड़े लोगों को भी खा जाएगा।“ इससे लोग ज्यादा डर गये।

लोगों को बहुत दुःख होता है। क्योंकि लोग बगीचे में जाकर पत्ते, फल और फूल नहीं ले सकते।

रामू काका कोई अच्छा काम नहीं कर रहे थे। देर से काम पर आते हैं और जल्दी चले जाते हैं। यह देख कर दिलीप बाबु ने एक दिन रामू काका को काम पर न आने को कहा।

Best hindi story में रामू काका ने गांव वालों से क्या कहा?

रामू काका बहुत दुखी हुए, उसने गांव में जाकर गांव वालों से कहा कि सांप को छोड़ने की बात झूठ है। गांव वाले इसे झूठ समझकर रोज बगीचे में जाते थे। एक दिन पांच लोग रात को बगीचे में गये और सोचा कि ‘पेड़ काटकर लाया जाए।’

वे सभी पेड़ को काटने में व्यस्त थे। धीरे-धीरे एक अजगर सांप आया और एक के पैर को दबोच लिया। आदमी ने जोर से चिल्लाया। रात में किसी को कुछ नजर नहीं आता। हर कोई उसके पास पूछने के लिए दौड़ा कि क्या हुआ ! आदमी सांप सांप चिल्लाता है ।

रात के समय कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने जाकर सांप को कुल्हाड़ी से घायल कर दिया। सांप उस आदमी को छोड़ दिया। फिर भी वह आदमी सांप सांप चिल्ला रहा था। उसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। उन्होंने सोचा, “हम चोरी करने क्यों गये थे।”

लकड़ी चोरों ने वहाँ से लौट कर रामू काका को पीटने लगे। चोरों ने पूछा, “रामू काका ने सांप न होने के बारे में झूठ क्यों बोला?” यह सुनकर रामू काका आश्चर्यचकित रह गये ! मैंने गांव वालों को अपने मालिक के नाम से क्यों झूट बोला?

रामू काका रात में धीरे-धीरे दिलीप बाबु के घर गये और दरवाजा  खटखटाये। दिलीप बाबु उठे और दरवाज़ा खोला! रामू काका “तुम्हें क्या हुआ”? रामू काका ने सब कुछ कहा। दिलीप बाबु ने मन में सोचा, ‘ईश्वर जो करते हैं वह प्राणियों के कल्याण के लिए करते हैं’ और घर के अंदर चले गए।

तब गांव के लोगों ने यह निर्णय लिया कि “वह किसी की बगीचे से कुछ नहीं चुराएंगे ।” जो मेहनत की कमाई होगी, वही खा कर खुश रहेंगे।”

उस दिन से रामपुर गांव में कुछ भी नहीं खोया। सभी खुश थे।

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Satya Yug ki Kahani – सत्य युग की कहानी

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satya yug ki kahani -bramha and narad muni

Satya Yug ki Kahani – सत्य युग की कहानी  :  यह कहानी सत्य युग की समय का है । पुराण युग के बारे में सुनकर हमें जितनी खुशी होती है उतनी ही हैरानी भी होती है। अतीत में, पहाड़ों के पंख होते थे। यह एक कहानी बताता है कि यह अब कैसे गायब हो गया है।

एक बार ब्रह्मा आसन पर बैठे हुए नरलोक के बारे में सोच रहे थे। इसी समय नारद ने ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। वह ब्रह्मा जी के पास गये और बोला, “पिताजी! मेरा प्रणाम स्वीकार करें।”

ब्रह्मा जी  ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “बस! आने का अभिप्राय क्या है ?” नारद जी ने कहा, “भगवान्, आप सृष्टि के रचयिता हैं, लेकिन इस सृष्टि में कुछ अपवाद भी हैं, जो बहुत कुरूप हैं।”

नारद की यह बात सुनकर ब्रह्मा जी थोड़ा परेशान हुए और बोले, ‘बताओ वह क्या है?’ जब सृष्टि प्रारम्भ हुई तो कौन कहाँ रहेगा इसकी सूची तैयार करने के लिए विश्वकर्मा को देवलोक, नरलोक और पाताललोक भेजा गया था।”

ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर नारद जी बोले- “मैं उस सूची के बारे में बात करने नहीं आया हूँ।”

एक दिन मैं नरलोक गया और वहां जो कुछ हुआ उसे देखकर कोई एक क्षण भी नहीं रुक सकता। यह सुनकर ब्रह्मा जी बोले, ‘क्या समस्या है बताओ, उसका निवारण किया जाएगा।’

नारद जी ने कहा, भगवन्! इतनी बड़ी-बड़ी कठोर चट्टानों और पेड़ों से युक्त पहाड़ों के शरीर पर पंख लगे हुए हैं, इसलिए वे उड़ रहे हैं और गाँवों और कस्बों पर बैठ रहे हैं। यह सब कुछ नष्ट कर देता है ।

एक दिन जब मैं आकाश की ओर जा रहा था तो एक पहाड़ उड़ता हुआ आया और मुझ  से टकरा गया। नतीजा यह हुआ कि मैं बेहोश हो गया ।

मैं कैलाश पर्वत पर जा गिरा । उस दौरान शिव जी तपस्या में बैठे थे। शिव जी ने अपनी तपस्या पूरी की और कमंडल पानी से मुझे बचाया।

Satya Yug ki Kahani में ब्रम्हा जी ने क्या किया

तब ब्रह्मा जी ने कहा, ‘क्या आप जानते हैं कि पर्वत को पंख क्यों दिए गए थे? लोगों की भलाई के लिए काम करने को पंख दिये गये. जब एक क्षेत्र के लोगों ने घर बनाने के लिए उस पहाड़ से पत्थर, लकड़ी, मिट्टी और शरीर के लिए औषधीय जड़ी-बूटियाँ ले जाने से लाभ उठाया जा सके। उन्होंने वह स्थान छोड़ कर  और अन्य लोगों की मदद करने के लिए जाते थे ।  लेकिन ये तो बेतरतीब से घूम रहे हैं।’

यह सोचकर ब्रह्मा जी को कोई और रास्ता नहीं सूझा। उन्होंने तुरंत इंद्र को बुलाया और कहा, “तुम वज्र मार के पर्वतों के पंख काट दो।”

ब्रह्मा की यह बात सुनकर इन्द्र ने वज्र से पर्वतों के पंख काट दिये। उस दिन से वे कहीं और उड़ नहीं सके।

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Best Moral Hindi Story Santon ki Pariksha – संतों की परीक्षा

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Best Moral Hindi Story-संतों की परीक्षा –   बहुत पुरानी कहानी है। देवपुरी राज्य में एक आश्रम था। उस आश्रम में तीन साधु रहते थे। पहले संत का नाम संत रामदास था। दूसरे संत का नाम संत रामेश्वर  और तीसरे का नाम संत चिदानंद था।

संत रामदास और संत रामेश्वर हमेशा झगड़ते रहते थे। संत रामदास कहते थे कि वे सर्वश्रेष्ठ संत हैं। संत रामेश्वर भी कहते थे कि वे सर्वश्रेष्ठ संत हैं। लेकिन साधु चिदानंद उन्हें हमेशा समझाते थे। वे कहते थे कि इस संसार में संत ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

यह सुनकर संत रामदास और संत रामेश्वर हंस पड़े और बोले – ‘क्या बात कर रहे हो चिदानंद? यदि आप अपने नाम के आगे संत शब्द लगाएंगे तो क्या आप हमारे जैसे संत हो सकते हैं? स्वयं को धार्मिकता सिद्ध करना आपकी कमजोरी है। दोनों संतों की बातें सुनकर संत चिदानंद ने कहा- ‘संत बनने के लिए ‘साधु’ शब्द का प्रयोग ही काफी नहीं है। अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा और सही कर्तव्य ही धर्म है।

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तीनों संतों की बातें स्वयं भगवान विष्णु ने सुनीं। एक दिन भगवान विष्णु तीनों संतों की परीक्षा लेने के लिए देवपुरी आश्रम में आये। भगवान स्वयं सामान्य रीति से आश्रम में आये।

उन्होंने कहा- मैं दिशाहीन पथिक हूँ । रास्ता भटक गया हूँ और इस आश्रम में पहुंच गया। तीनों ऋषियों ने कहा-यह हमारा सौभाग्य है। सेवा ही हमारा धर्म है। तुम आओ अपने हाथ-पैर धो लो और थोड़ा ठंडा पानी पी लो। तुम आराम महसूस करोगे।

संत रामदास पथिक को वापस अपनी कुटिया में ले गये। भगवान विष्णु ने कुछ देर वहीं विश्राम किया। तब संत रामदास ने कहा- पथिक महोदय, आपको भूख लगी होगी। हमारे आश्रम में तीन आम के पेड़ हैं और वह बहुत मीठे हैं। आइए भूख मिटाने के लिए आम खाएं।

तीनों संत और पथिक आश्रम के बगीचे में पहुंचे। संत रामदास एक बड़ा बांस लेकर आए और अपने आम के पेड़ की शाखाओं को पीटने लगे। पेड़ से आम गिरने लगे। पथिक ने एक आम उठाकर खाया और बोला- आप मेरे लिए मेहनत से आम तोड़े लेकिन आप के  पेड़ के आम इतने मीठे नहीं लगे।

तभी संत रामेश्वर एक बड़ी रस्सी लेकर आए और आम के डालीयों फांद कर वह उस रस्सी से अपने पेड़ की शाखाओं को हिलाने लगे। आम झड़ने लगे। पथिक ने आम उठाकर खा लिया। उसने कहा- मैं यह आम नहीं खा सकता। ये आम भी उतना मीठा नहीं है।

तब साधु चिदानंद अपने आम के पेड़ के पास गये। बड़ी कठिनाई से आम के पेड़ पर चढ़े। कुछ देर बाद अच्छे अच्छे  दो आम लेकर आम के पेड़ से नीचे उतरे।

संत रामदास और संत रामेश्वर ने उनसे कहा- तुम कितने मूर्ख हो। पथिक को आम खिलाने के लिए इतना समय लगा दिया ।  साधु चिदानंद ने कहा- यह आम का पेड़ मैंने अपने हाथों से लगाया है। मैं इसे आपकी तरह बांस से पिट पिट कर कष्ट देना नहीं चाहता था। एक को कष्ट देकर दूसरे को ख़ुशी नहीं दी जा सकती। और मैं अपने पेड़ का गला रस्सी से नहीं घोंट सकता। वह ऐसे दर्द देने की बजाय मेहमान को पानी पिलाकर संतुष्ट करना चाहिए । मैं स्वयं आम के पेड़ पर चढ़ गया और दो पके आम ले आया।

आम पथिक को जरूर खाने चाहिए। भगवान विष्णु ने दो आम खाये। उसने कहा- इस आम के पेड़ के आम बहुत मीठे हैं। ऐसा आम मैंने पहले कभी नहीं खाया। आप सचमुच महान हैं। दयालु चिदानंद ने यह सुने और संत रामदास और संत रामेश्वर बहुत क्रोधित हुए।

उन्होंने कहा- हे पथिक! हमारे पेड़ के आम भी कम मीठे नहीं हैं । आप संत चिदानंद की अनावश्यक प्रशंसा करते हैं और हमारा अपमान करते हैं। आपका पक्षपातपूर्ण व्यवहार पूर्णतः अस्वीकार्य है।

भगवान विष्णु जी अपने मूल स्वरुप में आये  (Best Moral Hindi Story)

उसके बाद पथिक अपने मूल स्वरूप में आ गये। भगवान विष्णु स्वयं तीनों संतों के सामने प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने कहा- हे मुनियों! मैंने आपकी सारी बातें सुनीं। मुझे आपकी विवेकशीलता का परीक्षण करने में रुचि है। और मैं पथिक के भेष में तुम्हारी पवित्रता की परीक्षा लेने आया था। मैं आपकी सेवा से संतुष्ट हूं।

लेकिन रामदास और रामेश्वर संत बनने के योग्य नहीं हैं। तुम्हारे हृदय में दया नहीं है। केवल ईर्ष्या और निंदा से भरा हुआ है। लेकिन संत दयालु चिदानंद में असीम दया और प्रेम है। वह पेड़ों को वैसे ही देखता है जैसे वह मनुष्य को देखता है। मैं सब के शरीर में विद्यमान हूं।

जब रामदास ने आम के पेड़ को बांस से पीटा  मेरे शरीर पर बहुत सारे घाव हो गये जिससे मुझे बहुत दर्द हुआ था। आम इतने मीठे नहीं लगे। उसी प्रकार मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे रामेश्वर मेरी गर्दन में रस्सी डालकर और आम के पेड़ को खींचकर मेरा गला घोंट रहा है। लेकिन फिर, जब साधु चिदानंद एक पेड़ पर चढ़ गए और मेरे लिए दो पके आम लाए, तो मेरे शरीर को कोई नुकसान नहीं हुआ। वह न तो लालची है और न ही हिंसक। पेड़ के प्रति उसका स्नेह और प्रेम अनंत है ।

दयालु चिदानंद की ऐसी सेवा से, मैं आपके द्वारा उत्पन्न सभी कष्टों को दूर करने में सक्षम हो गया। तब भगवान विष्णु ने कहा- केवल संत चिदानंद ही संत पद के पात्र हैं। सिर्फ संत शब्द लगा देने से कोई संत नहीं हो जाता। संत बनने के लिए सबसे पहले मन और हृदय में दया, प्रेम और सेवा भाव का होना जरूरी है, जो संत चिदानंद के शरीर में कूट-कूट कर भरा है।

इसलिये आज से संत दयालु चिदानंद  जिन्दगी भर  संत रहेंगे और आप दोनों संत दयालु चिदानंद के सेवक रहेंगे। यह सुनकर रामदास और रामेश्वर को अपनी गलती का एहसास हुआ। भगवान विष्णु ने उन्हें क्षमा प्रदान कर दी। उन्होंने प्रभु की शरण ली। अपने शेष जीवन में, संत चिदानंद ने दुनिया की भलाई के लिए काम किया।

 

इस कहानी की शिख – एक को  कष्ट देकर दुसरे को  ख़ुशी  नहीं दी जा सकती ।  हमेशा अपने मन में दया का भाव रखना चाहिए , तभी तुम अच्छे इन्सान बन पाओगे ।

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