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AKBAR BIRBAL STORY

akbar birbal ki kahani – बीरबल की चतुराई

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akbar birbal ki kahani

       जब भी बादशाह अकबर को समय मिलता है तो वे अक्सर बीरबल  के साथ  हलके फुलके  विषयों पर चर्चा करते हैं ।

      ताकि दरबार के  बोझिल माहौल को खुसनुमा बनाया जा सके। बादशाह अकबर बीरबल से घुमा फिरा कर सवाल पूछा करते हैं और बीरबल उसी तरह घूमा फिरा कर उसका जवाब देते हैं  जिससे  सभी राज दरबारियों का  खूब मनोरंजन  होता है।

 दरअसल बादशाह अकबर अपने प्रिय बीरबल की बुद्धि को हमेशा तेज बनाये रखते थे। वे जानते थे की हम अपनी बुद्धि को जितना अधिक प्रयोग करते है, वो उतनी ही तेज होती जाती है।

अकबर ने सवाल पूछे – akbar birbal ki kahani

       एक दिन राज सभा बैठी थी। भारी बहस के बाद बादशाह अकबर ने  एक टेढ़ा सवाल बीरबल को पूछा। बादशाह अकबर ने कहा  “ बीरबल, तुम्हारे लिए एक सवाल है।

     देखे की तुम क्या जवाब देते हो? अगर तुम्हें सोने के सिक्के और न्याय के बीच किसी एक का चुनाव करना हो तो तुम किसे चुनोगे ?”

बीरबल ने कुछ क्षण तक विचार किया और फिर बोला, “जहांपनाह! मैं तो अपने लिए सोने का सिक्का चुनुंगा।” यह सुनकर बादशाह अकबर चौंक गए।

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उन्होंने पहली बार लगा की बीरबल का उत्तर ने उन्हें निराश किया था। वे सोच भी नहीं सकते थे की बीरबल न्याय की स्थान पर सोने की सिक्के  का चुनाव करेंगे।

      बादशाह अकबर ने बीरबल से कहा  मुझे तुम्हारा उत्तर सुनकर सदमा लगा। मैं नहीं जानता था की तुम धन के लिए इतने लालची हो। मुझे तो यही लगा था  कि तुम हमेशा दूसरों की भलाई चाहते हो इसलिए तुम हमेशा न्याय का साथ दोगे।में तुमसे फिर वही सवाल पूछता हूँ , क्या तुम अपना जवाब बदलना चाहोगे ?”

यह सुनकर बीरबल ने जवाब दिया “जहांपनाह! माफ़ करें, में अपना उत्तर नहीं बदलना चाहता क्यों की मैंने कुछ  गलत नहीं कहा । मैं अब भी यही कहूंगा की में न्याय के बदले सोने का सिक्का  लेना चाहूंगा।”

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      बादशाह अकबर को यह सुन कर बहुत बुरा लगा  और वे बोले , “तुम बिना सोच – विचार के  ऐसे जवाब क्यों दे रहे हो? क्या तुम हमारे राज्य का आदर्श वाक्य भी भूल गए? 

      क्या हम यह नहीं कहते कि हम अपने नागरिकों को सदा न्याय प्रदान करेंगे। मुझे जानकर बहुत दु:ख हुआ कि तुम्हारे लिए न्याय कोई मायने नहीं रखता। मुझे तो लगता कि मेरे प्रिय होने की कारण तुम मेरे राज्य के बहुत महत्वपूर्ण हिस्से हो। तुम हमेशा दूसरों को न्याय दिलवाने की हर कोशिश में मेरे साथ रहोगे?”

बीरबल ने समझाया  – akbar birbal ki kahani

       बीरबल बहुत ही धैर्य और सब्र से बादशाह अकबर की सारी बात सुन रहे थे । ज्यों ही बादशाह अकबर ने अपनी बात समाप्त की। बीरबल बोले  “जहांपनाह, में आपसे क्षमा चाहूंगा । में आपको नीचा नहीं दिखाना चाहता था पर सच तो यह है की में में अपने लिए सोने का सिक्का ही चुनता।

       मैं जानता हूँ कि आप एक न्यायिक शासक हैं। आप हमेशा दुखियारी को न्याय देते आए हैं। मुझे पूरा विश्वास है की राज्य में कभी किसी के साथ अन्याय हो ही नहीं सकता। में एक गरीब आदमी हूँ मेरे पास बहुत ज्यादा धन और बहुमूल्य सामान नहीं है। मुझे अपने परिवार की देखरेख भी करनी होती है। यही कारण है कि सोने के सिक्के वाला जवाब चुना। ”

बीरबल के जवाब से बादशाह अकबर संतुष्ट हो गए।

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akbar birbal ki kahani – अकबर और बीरबल की मुलाकात

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Akbar aur Birbal ki kahani

Akbar Birbal ki Kahani  – पहला भाग

     Akbar Birbal ki Kahani –  एक  बार  की  बात  है, बादशाह  अकबर अपने दरबारियों  के साथ शिकार के लिए जंगल निकल गए। वे शिकार खेलते खेलते  अपने राजमहल से बहुत आगे  निकल गए । उस दिन  अकबर  की चाल थोड़ी धीमी थी।

     उनके कुछ दरबारी तेज थे उनसे आगे निकल गये। बादशाह अकबर अपने  कुछ  दरबारियों  के साथ  पीछे रह गये । शिकार तो नहीं मिला पर रास्ता भटक गए। धीरे धीरे सूरज डूब रहा था  और वे महल  तक  जाने का रास्ता  भूल  गए। वे सभी जंगल से  बहार आने की कोशिस कर रहे थे।  तब तक, सबको भूख और प्यास से  पेट में चूहे कूद रहे थे।

Akbar aur Birbal ki kahani - akbar in jungle

Akbar aur Birbal ki kahani – akbar in jungle

      कुछ देर बाद, उन्हें जंगल में एक रास्ता दिखाई दिया । बादशाह अकबर और  साथ चल रहे दरबारि तेजी से  उस रास्ते  की और  बढ़ने लगे।  उनको लगा कि  वे सभी  बड़े आसानी से  राजमहल पहुँच जायेंगे।

     जब वे लोग  आगे बढ़ रहे थे  तो देखा की  वह रास्ता  अलग तिन  रास्तों में बंट रहा था। तो उनके होंस उड़ गये और आपस में बहस करने लगें की उन्हें किस रास्ते से जाना ठीक होगा।

        बादशाह अकबर भी परेशान  हो  गए और अपने आप से बोले  , में  कैसे  पता लगाऊं की  महल  की  और कौन सा रास्ता जाता है। मेरे साथ  मेरे राजदरबारी मित्र भी भूखे  और प्यासे  है।  अरे कोई तो उपाय बताओ। हमें किसी भी तरह महल पहुँचना होगा।

       तभी एक आदमी लकड़ी काट कर अपने  घर को जा रहा था। बादशाह अकबर उसे अपने पास बुलाया और बोला  – “अरे ओ लकड़ी वाले सुनोतो जरा, मुझे ए बताओ की  इनमैं  से  कौन सा रास्ता  महल की तरफ ले जाएगा।“

      उस आदमी ने थोड़ा मुस्कुराते  हुए जवाब दिया की – “हुजुर कोई भी रास्ता महल या किसी भी जगह कैसे ले जा सकता है।“ अकबर यह सुन कर बहुत हैरान और परेशान  हो गये । उस आदमी ने बोला “यह  तो मालूम है कि रास्ते कहीं नहीं जाते।“ अब अकबर को  उसका  मजाक  समझ आया और  वे  अपने  दरबारियों के साथ  मिल कर हंसने लगे। 

Akbar meet Birbal

Akbar meet Birbal

      मजाक  तो ठीक था पर  महल  जाने का रास्ता  अब तक पता नहीं चला था। उस आदमी ने  बड़े  ही आदर  से  कहा ,  “हम  लोग  ही  एक जगह से दूसरी जगह पर आ जा सकते हैं, रास्ते  ऐसा  काम  नहीं  कर सकते।”

     बादशाह अकबर समझ  गए  की  यह आदमी  मजाक में  भी  सच्चाई थी  उन्होंने  उससे  कहा ,  “हाँ में मानता हूँ  की  तुम जो  बोल रहे हो वह ठीक है।”

अकबर ने पुछा  “तुम्हारा नाम क्या है?” आदमी ने बोला  “हुजूर मेरा नाम  महेश  दास भट्ट है” आदमी ने फिर से पूछा “आप कौन है ? इससे पहले आपको पहले कभी नहीं देखा है।“

बादशाह अकबर ने उसको कहा  – “मैं हिंदुस्तान का शहंशाह  बादशाह अकबर हूँ”

फिर उन्होंने अपनी अंगूठी  देते हुए कहा,  “ये लो,  मेरी अंगूठी रखो । तुम बहुत  ही अक्लमंद और अनोखे  इंसान हो। मुझसे मिलने दरबार जरूर आना । इस अंगूठी को देख कर पहचान  लूँगा।”

    महेस भट्ट अंगूठी को लेते हुए बोला  “बहुत बहुत  मेहरबानी । में बहुत  खुद किस्मत इंसान  हूँ जो आप से मुलाकात हुई।”

      बादशाह अकबर बोले “अब मुझे  महल जाने का रास्ता बता दो, मुझे  अपने  महल  जल्दी वापिस  पहुँचना है।“  महेश ने  खुसी खुसी  अकबर से अंगूठी का उपहार लेकर धन्यवाद  दिया  और उन्हें महल जाने का रास्ता भी बता दिया।

Akbar Birbal ki Kahani  – दूसरा  भाग

    जब अकबर महेश दास को वह अंगूठी  देकर  चले गये  तो वह अक्सर उसे  उलट-पलट कर देखा करता था। उसे अच्छी तरह  याद था  की अकबर ने दरबार  में  अंगूठी  की निशानी दिखा  कर मिलने के लिए कहा था।

     वह पहले कभी महल नहीं गया था और न ही वहां किसी  को जानता था। परन्तु एक दिन, महेश दास ने तय  कर  लिया  की  वह  अकबर से मिलने जाएगा। उसने महल जाने के लिए अपना सामान  बांधा और  राज महल के लिए  रवाना हो गया ।

जब वह महल पहुंचा तो एक दरवान ने  दरबार में  जाने से  पहले ही रोक लिया। महेश ने उसे बादशाह अकबर की दी हुई अंगूठी दिखाई।

Birbal meet security guard

Birbal meet security guard

      महेश ने बोला –“भाई ! मुझे बादशाह अकबर ने मिलने लिए बुलाया है। यह  देखो उनकी दी हुई अंगूठी। निशानी की तौर पर मेरे पास है। ”

        अंगूठी को देखकर दरबान का लालच  जाग उठा। उसने कहा। – “सुनो भाई, में तुम्हे एक शर्त पर दरबार में  जाने दूंगा।” ठीक है, अपनी शर्त बताओ। “ महेश बोला।

        दरबान ने कहा –“अगर तुम्हें बादशाह अकबर से भेंट करने के बाद कोई भी इनाम  मिला  तो तुम्हें उसमें से आधा हिस्सा  मुझे  देना  होगा।”

महेश  दरबान  की बात  सुनकर हैरान  रह गया  पर  उसने  लालची दरबान  की शर्त  मान ली।

         महेश दरबार में पहुंचा तो अकबर का  दरबार लगा हुआ था  महेश दरबार और महल की सुंदरता देख मोहित हो गया । सारे दरबारी अपने अपने स्थान पर बैठे थे। दरबार की शोभा निराली थी।

“तुम कौन हो नौजवान ? यहाँ क्या करने आये हो?” बादशाह ने पुछा।

           “जहांपनाह ! मैं महेश दास हूँ । आपने ही  मिलने के लिए  बुलाया था।” महेश ने जवाब दिया। जब  बादशाह अकबर को कुछ  याद  नहीं  आया तो उसने  उन्हें  वह अंगूठी  दिखाई  और जंगल  में  रास्ता  भटकने  वाली  बातें  याद दिलाई।

            उस अंगूठी को देखते ही  अकबर को  सारी बातें याद आ गया। उन्होंने महेश को पास बुलाया।  उन्हें  महेश  दास  को  अपने सामने  देख कर बहुत खुश हुए । बादशाह ने  खुश होकर  कहा “ जो  तुम्हारे जी में  आए, वह  इनाम  मांग लो।”

        महेस ने दरबान की बात भूली नहीं थी, उसने कहा  “जहांपनाह मुझे बीस कोड़े  लगवाए जायें”। यह सुनकर   दरबार  में  सभी  हैरान  रह गये । अकबर जानते थे  की  महेश  की इस  बात  में  भी कोई  राज  छिपा था। उन्होंने  दरबारी  से  महेश  की  इच्छा  पूरी  करने  को कहा।

        जब  महेश को  दस  कोड़े  लग गये  तो  उसने  दरबारी  से  रुकने  को कहा । फिर  उसने  दरबान  वाला  किस्सा  सबको सुना दिया। यह  सुन कर अकबर को बहुत गुस्सा आया और लालची दरबान को दरबार में  हाजिर  होने का  हुक्म  दिया गया।

birbal meet akbar

birbal meet akbar

     अकबरने  दरबान  को  पचास  कोड़े  मारने का आदेश दिया।  उसे  तिन साल तक कैद में रखने का आदेश दिया ।

         अकबर ने  महेश दास को  समझदारी  से  खुस  हो कर  उसे  अपने यहाँ  दीवान बना दिया और बीरबल के नाम से  पुकारने लगे। दरबान  को  अपने लालच का फल  मिला और महेश दास,  बीरबल  के  नाम से  लोकप्रिय  हो गये ।

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AKBAR BIRBAL STORY

Best akbar birbal ki kahani – अकबर की आँख खुली

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Akbar Birbal ki Kahani – अकबर की आँख खुली

      एक दिन  बादशाह अकबर और बीरबल आम के बगीचे में टहल रहे थे । वे हमेशा की तरह अलग-अलग विषयों पर आलोचना कर रहे थे। अचानक ही एक तीर बादशाह अकबर के सिर के ऊपर से  होते हुए निकल गया। उन्होंने सिर झुका लिया वरना क्या  हो जाता।

        यह देख कर उन्हें बहुत गुस्सा आया । पहले उन्हें लगा की किसी ने उन्हें मारने की साजिश रची है। उन्होंने झट से अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि  तीर चलाने वाले को पकड़ कर, मौत के घाट उतार दिया जाये।

    कुछ ही देर में , सिपाहियों ने  एक लड़के को घसीटते हुए ले आये, जो बहुत ही डरा हुआ दिखाई दे रहा था। एक  सिपाही ने कहा  “जहांपनाह ! इसी लड़के ने  आप पर तीर चलाया है।”

बादशाह अकबर बोले  “ लड़के! तुमने हिंदुस्तान के जहांपनाह पर तीर चलाया है, तुन्हें माफ़ नहीं किया जायेगा।”

“नहीं-नहीं ! मैंने  ऐसा कुछ नहीं किया ” लड़का रोते-रोते बोला।

बादशाह अकबर ने अपने सिपाहियों से कहा  “इसे उसी तरह मार दो, जिस तरह इसने मुझे मारना चाहा। इसे  पकड़ो और इस पर तीर चलाओ। अगर यह नहीं मारा गया तो याद रखना , तुम सबको मौत के घाट उतार दिया जाएगा । ” बादशाह अकबर वाकई बहुत गुस्से मैं थे।

       वह लड़का जोर-जोर से रोने लगा। उसने कहा, “जहांपनाह ! मैं आपसे माफ़ी चाहता हूं। मेरा विश्वास करें, मैं आपको मारने की साजिश नहीं  कर रहा था। मैं  तो अपनी भूखी माँ के लिए आम के बगीचे में आम तोड़ने के लिए तीर चला रहा था। 

     वह तीर गलती से आपकी तरफ आ गया। मेहरबानी करके मुझे छोड़ दें । फिर कभी ऐसी भूल नहीं होगी। मैं शाही  बाग़ की और कदम तक नहीं रखूंगा।”

akbar aur birbal  ki kahani   - akbar ki  ankh khuli image

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पर बादशाह अकबर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने निर्दोष बालक की फरियाद  को अनसुना  कर, उसे मारने का आदेश दिया। बीरबल जानते थे कि उसमें उस लड़के की कोई गलती नहीं थी और बादशाह अकबर उसे मारने का हुक्म सुना कर  उचित नहीं  कर रहे हैं।

बीरबल लड़के की जन बचने की कोसिस की  – akbar birbal ki kahani

  उन्होंने तय किया कि  वे  उस  लड़के की जान  बचाने के लिए  कोई  उपाय  करेंगे। वे  किसी के भी  प्रति अन्याय  नहीं सह सकते थे । तभी सिपाहियों ने लड़के को आम के पेड़ से  बांध  दिया। ज्यों ही एक  सिपाही तीर चलाने लगा  तो  बीरबल ने उसे रोक दिया।

      यह देखकर अकबर को बुरा लगा और वे बोले, “बीरबल तुम्हारी इतनी मजाल कि तुम  मेरे दिए हुए आदेश  को काट रहे हो? इस लड़के ने  हिंदुस्तान  के बादशाह पर वार किया है। इसे तो इसका  अंजाम भुगतना  ही होगा।”

बीरबल ने अपने हाथ जोड़े और बादशाह अकबर से बोले,  “जहांपनाह !आपसे माफ़ी चाहूंगा परन्तु यह तो अन्याय है। आपने  कहा कि इसे वैसे  ही मारा जाना चाहिए, जैसे   इसने  आपको  मारने  की कोशिश की।

    फिर तो  सिपाही  को आम के पेड़ पर निशाना  लगाना चाहिए ताकि  वह  निशाना चुके और  इस  लड़के  को तीर आ कर लगे।  तभी तो आपका आदेश पूरा होगा।”

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akbar birbal ki kahani में आया रोचक घटना बीरबल ने किया खुलासा       

उसके बाद बीरबल को कूछ याद आया। “कुछ क्षण जहांपनाह, इस लड़के को थोडा जान लूं इसने ऐसा क्यूँ किया। बादशाह के राज्य में कोई भूखा नहीं रहता है । सबको खाना मिलता है सबको ठीक से काम मिलता है। पर  यह क्यों छूट गया।”

बीरबल ने पुछा “तुम्हारा नाम क्या है और तुम किस गाँव से हो?”

लड़के ने जवाब दिया “मेरा नाम दीपक है मैं नारायणपुर गाँव में रहता हूं ”

     “नारायणपुर गाँव में ढेर सारा विकास का काम हुआ है, जैसे कुआँ खोदना, नया रास्ते बनाना और तालाब खुदवाना । क्या तुमने वहां काम नहीं किया?” बीरबल ने पुछा

तभी लड़के ने जवाब दिया “हमने काम किया था पर ठेक्केदार हमको पूरा पैसे नहीं देता है। आधा पैसा अपने पास रख लेता है । तिन चार दिन से बहुत मेहनत करवाया लेकिन कुछ नहीं दिया । 

    पैसे मांगने जाता था तो मार के भगा देता था। मैं और मेरी माँ तिन-चार दिन से  खाना नहीं खाया है । इसलिए में आम के बगीचे में आ गया।

लड़के की कहानी सुनकर बादशाह अकबर को एहसास हो गया की वे गुस्से में आकर एक मासूम की जान लेने जा रहे थे। उन्होंने उस लड़के की जान बख्श दी और उसे  आमो  के टोकरे  के साथ  विदा दी।

    “सिपाहियों तुरंत जाओ नारायणपुर के ठेक्केदार को यहाँ घसीट कर दरबार में लाओ। अब उसको में ऐसी सजा दूंगा की जिंदगी भर  याद रखेगा।” यह अकबर ने बोले।

    उस दिन शाम बादशाह अकबर ने बीरबल से  अकेले  में  बात करते हुए धन्यवाद दिया और बोले, “बीरबल! तुम  उन चापलूसों  में से नहीं  जो मेरी  हां में हां  मिलाते  हैं। आज तुम्हारी बजह से उस  लड़के की जान बच गई। वरना मेरे  हाथों एक बेगुनाह  का  खून  हो जाता। “  बीरबल यह सुनकर मुस्कुराने लगे।

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akbar birbal ki kahani Jyotishi aur Akbar- ज्योतिषी और अकबर

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Akbar Birbal ki Kahani Jyotishi aur Akbar

         एक बार कि बात है । बादशाह अकबर के दरबार में एक मशहूर ज्योतिषी आये हुए थे। बादशाह अकबर ने उनके बारे में सुन रखा था । उन्होंने उन्हें अपने राजमहल आने का निमंत्रण दिया। ज्योतिषी को बादशाह अकबर का निमंत्रण पा कर बहुत खुश हुए। ज्योतिषी ने राजमहल जाने की तैयारी कि।

बादशाह अकबर ज्योतिषी से बोले “मैं यह जानना चाहता हूँ की आपकी मृत्यु किस दिन होगी, आप अनुमान लगा कर बतायें।”

 ज्योतिषी ने कहा  “जहांपनाह , मुझे गणना करने के लिए थोड़ा समय चाहिए ।” बादशाह अकबर ने उसे दो घंटे का समय दिया।

        ज्योतिषी मौके पाते ही बीरबल के पास गए। उन्होंने सुन रखा था बादशाह अकबर के प्रिय मंत्री बीरबल के पास हर सवाल का जवाब होता है। उन्होंने जा कर कहा “मंत्री बीरबल! मेरी मदद करो।

           बादशाह अकबर ने मुझसे सवाल पुछा है कि मेरी मृत्यु कब होगी। ईमानदारी से कहूँ तो इसका जवाब तो मुझे नहीं पता है। मुझे इस बिषम संकट से बचाओ। मुझे उनके प्रश्न का कोई न कोई उत्तर तो देना होगा। ”

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         बीरबल ने उन्हें उनकीं समस्या का हल बता दिया और बादशाह अकबर के सामने बड़े ही आत्मविश्वास  से जाने के लिए कहा। जब ज्योतिषी दरबार में आये तो बादशाह अकबर ने कहा, “आशा करता हूं कि आपने उत्तर जान लिया है।”

ज्योतिषी बोले, “जी जहांपनाह ! मेरी गणना के अनुसार में तब तक जिऊंगा जब तक आप चाहेंगे। दरअसल मेरी मृत्यु आपके बाद होगी।”

      ऐसा उत्तर सुनकर बादशाह अकबर जान गए की ज्योतिषी को उस प्रश्न का उत्तर नहीं आता है। और बोले की तुम्हारे जवाब संतोषजनक नहीं है। तुम झूठ बोल रहे हो। और इसकी सजा तुम्हें मिलेगी। दरबान इसे ले जाओ और कैदखाने में डाल दो।

कुछ दिन बाद एक व्यापारी बादशाह अकबर से मिलने आया। वह बहुत जोर -जोर से रो रहा था। बादशाह अकबर ने पूछा, “तुम्हें क्या हुआ है ? तुम क्यों रो रहे हो ?”

       व्यापारी ने उत्तर दिया  “जहांपनाह,  किसी ने मेरा घर  का सारा चीज लुट लिया। वह मेरा सारा धन और बहुमूल्य सामान ले गया। उसने कोई सुराग नहीं छोड़ा। अब मैं कैसे जिऊंगा? आप एक न्यायिक शासक हैं। कृपया मेरी मदद करें।”

        बादशाह अकबर ने बीरबल को कहा की वह व्यापारी के घर जा कर आए ताकि वहां से कोई सुराग हाथ लग सके।

  बीरबल ने चोर को पकड़ा -akbar birbal ki kahani

          बीरबल को व्यापारी के घर तिन नौकर मिले उन तीनों ने साफ मना कर दिया की चोरी उन्होंने नहीं कि है। बीरबल को लग रह था की  उन तीनों में से ही कोई एक चोर है। उन्होंने  चोर को पकड़ने  कि योजना  बना लि। उन्हें पूरा यकिन था कि चोर आसानी से पकड़ में आ जायेगा।

       उन्होंने तीनों नौकरों को एक समान आकार की तिन छड़ियां दे कर कहा , “तुममें  से कोई भी आगे आ कर अपना गुनाह कबुल नहीं कर रहे हो इसलिए में तुम तीनों को जादुई  छड़ी दे रहा हूँ ।     

याद रखना कि यह एक समान लम्बाई की है। जो भी चोर होगा, उसकी छड़ी जादू से चार इंच बड़ी हो जाएगी। मैं तुम तीनों से कल सुबह मिलुंगा।”

akbar birbal ki kahani - akbar aur jyotishi pic

akbar birbal ki kahani – akbar aur jyotishi pic

 अगले ही दिन, बीरबल ने नौकरों को छड़ी दिखाने को कहा। उन्होंने देखा की एक नौकर ने यह सोच कर अपनी छड़ी पहले से ही चार इंच छोटी कर ली थी बीरबल सच  कह रहे थे और चोर की छड़ी बड़ी होने वाली थी। बीरबल बोले, वे जादुई छड़ियां नहीं थी।

        मैं तो केवल असली चोर का पता लगाना चाहता था और चोर खुद ही सामने आ गया।” इस तरह एक ही पल में बीरबल ने चोर को पकड़ लिया।

बीरबल ने अकबर को समझाया -akbar birbal ki kahani

       बीरबल  बोले “जहांपनाह ! कुछ दिन पहले आप ने एक ज्योतिषी को पकड़ा था। उसने जो उत्तर दिया था मेरे ही कहने पर दिया था।“

        “तुम क्या कह रहे हो बीरबल?” बादशाह अकबर ने बोले। तभी बीरबल ने कहा- “जी हुजुर, यह सच है की ज्योतिषी शास्त्र में मृत्यु ही एक सच है कि जिसकी भविष्यवाणी करना बहुत मुस्किल है। यह ग्रह स्थिति, दशा और उपदशा के आधार पर अनुमान कर सकता है लेकिन पूर्ण रूप से बताना बहुत कठिन कार्य है।

         लेकिन यह भाग्य है और भगवान के हाथ में है। ज्योतिषी इस पर चर्चा करके चिंता बढ़ाने जैसा है। एक अच्छे ज्योतिषी  को भी जातक दिखाने वाले को डराना नहीं चाहिए। जब आपको कोई बोल देगा आप की मृत्यु उसी दिन उसी समय तय है, तो वह आदमी कुछ भी काम करने लिए मन नहीं करेगा । तब कुछ न कुछ गलत कर देगा ।

       जैसा उस चोर ने किया। यह जीवन तो कर्म करने के लिए है । अच्छे  कर्म करोगे तो सम्मान मिलेगा बुरा कर्म करोगे तो दंड मिलेगा। हमारे कर्म तो ही हमें अपने सुख और बेहतर जीवन जीने कि आशा हमको लम्बे समय तक जिवीत रखता है।

यह सुनकर बादशाह अकबर को खुसी महसूस हुई, और ज्योतिषी को कारागार से मुक्त किया। बीरबल को दरबार में प्रशंसा की गयी ।

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